Home, All Blogs, My Posts List, All label5

शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2024

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 031-01-031(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ।।१।३१।।
निमित्तानि = लक्षणों को; च = और,भी; पश्यामि =देखता हूं; विपरीतानि = विपरीत; केशव = हे कृष्ण (हे केशी असुर को मारने वाले);न = नहीं; च = भी; और; (श्रेयोऽनुपश्यामि = श्रेय: + अनुपश्यामि); श्रेय: = कल्याण ; अनुपश्यामि = पहले से देख रहा हूंँ ; हत्वा = मारकर; स्वजनम् = अपने सगे-संबंधियों को; आहवे = युद्व में; ।
हे केशव ! मैं लक्षणों को भी विपरीत ही देख रहा हूँ तथा युद्ध में अपने सगे-संबंधियों को मारकर कल्याण भी पहले से ही नहीं देख पा रहा हूँ।।१।३१।।
लक्षण विपरीत हैं दिखते, हे केशव! इसे पहचानता ।
स्वजनों को मारकर, नहीं कल्याण पूर्व ही जानता।।१।३१।।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 030-01-030(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

 
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मन: ।।१।।३०।।
गाण्डीवम् = गाण्डीव धनुष; स्रंसते =गिरता है; (हस्तात्त्वक्चैव =हस्तात्+त्वक्+च+एवं); हस्तात् = हाथ से ; च =और; त्वक् = त्वचा; एव =भी; परिदह्यते = बहुत जलती है; न=नहीं ;च=और ; ( शक्नोम्यवस्थातुम् = शक्नोमि +अवस्थातुम् ) ; शक्नोमि = समर्थ ;अवस्थातुम् = खड़ा रहने को; भ्रमति इव =भ्रमित सा हो रहा है; में=मेरा; मन: = मन ।
हाथ से गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी बहुत जल रही है तथा मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है, इसलिये मैं खड़ा रहने को भी समर्थ नहीं हूँ ।।१।।३०।।
गाण्डीव जैसे धनुष मेरे, हस्त गिरते, त्वचा मेरी जल रही है।
मन भ्रमित-सा , असमर्थ स्थित, दशा अजब -सी हो रही है।।१।३०।।
हरि ॐ तत्सत्।
श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'

मंगलवार, 20 फ़रवरी 2024

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 028/029-01-028/029(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

अर्जुन उवाच -
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्णं युयुत्सुं समुपस्थितम् ।।१।२८।। 
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति । 
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ।।१।२९।।
कृष्ण =हे कृष्ण; इमम् =इस; युयुत्सुम् = युद्व की इच्छा वाले; समुपस्थितम् =खड़े हुए; स्वजनम् = स्वजन समुदाय को; द्रष्टा= देखकर; मम = मेरे; गात्राणि =अंग; सीदन्ति = शिथिल हुए जाते हैं; च = और; मुखम् =मुख (भी); परिशुष्यति = सूखा जाता है; च = और; मे = मेरे; शरीरे =शरीर में; वेपथु: =कम्प; च = तथा; रोमहर्ष: =रोमांच; जायते = होता है।अर्जुन बोले- हे कृष्ण ! युद्ध क्षेत्र में डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इस स्वजन समुदाय को देखकर मेरे अंग शिथिल हुए जा रहे हैं और मुख सूखा जा रहा है तथा मेरे शरीर में कम्पन एवं रोमांच हो रहा है ।।१।।२८ -२९।।
रणोत्सुक देख इन बांधवों को ,अंग शिथिल से, कृष्ण मेरे हो रहे हैं। 
मुख सूख रहे हैं, तन में मेरे रोमांच कंपन ,अजब कैसे हो रहे हैं।।१।।२८-२९।।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 027-01-027(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

तत्रापश्यत्स्थितान्‌ पार्थः पितॄनथ पितामहान्‌ ।
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ।।१।२७।।
तान् = उन्हें ; समीक्ष्य = देखकर ; स: = वह ; कौन्तेय: = कुन्ती का पुत्र (अर्जुन) ; (सर्वान्बन्धूनवस्थितान् = सर्वान्+बन्धून्+अवस्थितान्) ; सर्वान् = सभी को ; बन्धून् = संबन्धियों को ; अवस्थितान् = स्थित ; कृपया = दया (करुणा)से ; परया = अत्यधिक ; आविष्ट: = घिर गया ;(परयाविष्टो = परया + आविष्टो) ; ( विषीदन्निदमब्रवीत् = विषीदन्+इदम्+अब्रवीत् ) ; विषीदन् = शोक करता हुआ ; इदम् = यह ; अब्रवीत् = बोला ।
कुन्तीपुत्र अर्जुन ने जब अपने सभी संबन्धियों को वहां इस प्रकार स्थित देखा तो वह दया और करुणा से घिर गया और शोक करते हुए इस प्रकार बोला।
अर्जुन ने जब देखा बांधव, सगे- सम्बन्धी खड़े रण में।
बोला करुणा दया से घिर कर, शोक विकल बड़े मन में।।
१।२७।।

तान्समीक्ष्य स कौन्तेय सर्वान्बन्धूनवस्थितान्।

हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'



श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 026-01-026(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ॥
श्वशुरान्‌ सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।।१।२६।।(तत्रापश्यत्स्थितान्‌ = तत्र+अपश्यत्+स्थितान् ) ; तत्र = वहां ; अपश्यत् = देखा ; स्थितान् = खड़े ; पार्थ: = अर्जुन ; पितॄनथ् = पितरों को(चाचा, ताऊ आदि) ; पितामहान् = पितामहों को ; आचार्यान् = गुरुओं को ; मातुलान् = मामाओं को ; भ्रातृन् = भाइयों को ; पुत्रान् = पुत्रों को ; पौत्रान् = पोतों को ; सखीं = मित्रों को ; तथा = और ; श्वशुरान् = ससुरों को ; ( सुहृदश्चैव = सुहृद:+च+एव ) ; सुहृद: = शुभचिंतकों को ; च = और ; एव = निश्चय ही ; सेनयो: = दोनों सेनाओं के ; उभयो: = दोनों पक्षों के ; अपि = भी ।
वहां पार्थ ने अनेक पितरों (चाचा, ताऊ आदि), पितामहों,गुरुओं, मामाओं, भाइयों,पुत्रों, पौत्रों, मित्रों, श्वसुरों और शुभचिंतकों को युद्धभूमि में दोनों पक्षों की सेनाओं में युद्ध करने हेतु एकत्रित देखा।।१।२६।।
वहां पार्थ ने रण में देखा, पितर पितामह खड़े बड़े।
गुरु मामा भाई पुत्र सब, पौत्र मित्र भी भरे हुए।।
अनेक श्वसुर भी लड़ने आए, मरने को तैयार खड़े।
हितचिंतक नहीं हटने वाले,यम से भी जो नहीं डरे।।१।।२६।।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'





सोमवार, 19 फ़रवरी 2024

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 025-01-025(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्।
उवाच पार्थपश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति।।१।२५।।
भीष्म: =भीष्म पितामह ; द्रोण = द्रोणाचार्य ; प्रमुखत: = सामने,समक्ष ; सर्वेषां = सबों के ; च =और ; महीक्षिताम् = संपूर्ण धरती (राजा) के राजा ; उवाच = कहा ; पार्थ = अर्जुन (पृथा का पुत्र) ; (पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति = पश्य+एतान्+समवेतान्+कुरून्+इति) ; पश्य = देखो ; एतान् = इन सबों को ; समवेतान् = एकत्रित ; कुरून् = कुरुवंशियों को ; इति = इस प्रकार ।पितामह भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य और समस्त संसार के राजाओं के समक्ष भगवान श्रीकृष्ण ने इस प्रकार कहा कि हे पार्थ! यहां एकत्रित इन कुरुवंशियों को देखो‌।।१।२५।।
भीष्म महीप द्रोण समक्ष, प्रभु ने ऐसे वचन कहे।
देखो पार्थ इन वीरों को, कुरु-कुल के हैं नाम बड़े ।।१।२५।।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'




श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 024-01-024(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

संजय उवाच
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्।।१।२४।।
संजय: = संजय ने ; उवाच = कहा ; (एवमुक्त: = एवम्+उक्त:) ; एवम् = इस प्रकार ; उक्त: = कहे गए ; हृषीकेश: = अन्तर्यामी भगवान श्रीकृष्ण ; गुडाकेशेन = गुडाकेश के द्वारा (नींद पर विजय प्राप्त करने वाला अथवा घुंघराले बालों वाला गुडाकेश कहलाता है। अर्जुन में ये दोनों गुण थे।) ; भारत = हे भरतवंशी! (धृतराष्ट्र के लिए प्रयुक्त किया गया है) ; (सेनयोरुभयोर्मध्ये = सेनयो:+उभयो:+मध्ये) ; सेनयो: = दोनों सेनाओं के ; उभयो: = दोनों ; मध्ये = बीच में ; स्थापयित्वा = रोककर ; (रथोत्तमम् = रथ: + उत्तमम्) ; रथ: = रथ ; उत्तमम् = उत्तम ।
संजय ने कहा-
हे भरतवंशी! (धृतराष्ट्र) गुडाकेश अर्जुन के द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर अन्तर्यामी भगवान श्रीकृष्ण ने उस उत्तम रथ को दोनों सेनाओं के मध्य में लाकर खड़ा कर दिया।।१।२४।।
भारत!गुडाकेश अर्जुन ने, जब हरि से ऐसे वचन कहे।
सुनकर प्रभु उत्तम रथ लेकर, सैन्य-मध्य वे खड़े रहे।।१।२४।।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'