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श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ (हिन्दी पद्यानुवाद सहित) लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
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सोमवार, 26 फ़रवरी 2024

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 048-02-001(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

संजय उवाच-
तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदन: ।।२।१।।
संजय बोले-
इस प्रकार करुणा से व्याप्त और आँसुओं से पूर्ण तथा व्याकुल नेत्रों वाले शोकयुक्त उस अर्जुन से भगवान् मधुसूदन श्री कृष्ण ने यह वचन कहा ।।२।१।।
संजय = संजय; उवाच = बोले; तम् = उस(अर्जुन को;(कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् =कृपया+आविष्टम्+अ‌श्रुपूर्णा+कुलेक्षणम्); कृपया = करुणा से ; आविष्टम् = व्याप्त; अश्रुपूर्णा कुलेक्षणम् = आंसुओंसे पूर्ण; ( विषीदन्तमिदं = विषदन्तम् +इदं ); विषीदन्तम् = शोकयुक्त; इदम् = यह; वाक्यम् = वचन; उवाच = कहा; मधुसूदन: = भगवान् मधुसूदन (श्री कृष्ण ने )।
अश्रु नयन करुणा भरे, शोकाकुल अर्जुन बेचैन रहे।
मधुसूदन ने उन्हें देखकर , इस प्रकार के वचन कहे।।२।१।।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'

रविवार, 25 फ़रवरी 2024

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 047-01-047(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

संजय उवाच – 
एवमुक्त्वार्जुन: संख्ये रथोपस्थ उपाविशत् । 
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानस: ।।१।४७।।
एवम् = इस प्रकार;उक्त्वा =कहकर; अर्जुन: =अर्जुन; (एवमुक्त्वार्जुन: =एवम्+उक्त्वा+अर्जुन;संख्ये= रणभूमि में; (रथोपस्थ=रथ+उपस्थ);रथ = रथ के; उपस्थ=पिछले भाग में (आसन पर);उपाविशत् = बैठ गया;विसृज्य = त्यागकर; सशरम् = बाणसहित; चापम् =धनुष को; शोकसंविग्नमानस: = शोक से उद्विग्न मन वाला।
संजय -बोले 
रणभूमि में शोक से उद्विग्न मन वाला अर्जुन इस प्रकार कहकर वाण सहित धनुष को त्यागकर रथ के आसन पर बैठ गया ।।१।४७।।
संजय बोले – 
रणभूमि में उद्विग्न मन से अर्जुन ने धनु शर त्याग दिए। 
रथ आसन पर पीछे जा बैठे, रण लड़ने से वितराग किए।।१।४७।।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 046-01-046(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणय: । 
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ।।१।४६।।
यदि = यदि; (मामप्रतीकारमशस्त्रं =माम्+अप्रतीकारम् +अशस्त्रम्); माम्=मुझे; अप्रतीकारम् = न सामना करने वाले को;अशस्त्रम् = शस्त्ररहित: शस्त्रपाणय: = शस्त्रधारी; धार्तराष्ट्रा: =धृतराष्ट्र के पुत्र; रणे = रण में;(हन्युस्तन्मे=हन्यु:+तत्+मे); हन्यु: = मारें; तत् =वह; मे = मेरे ; क्षेमतरम् = अतिकल्याण कारक; भवेत् = होगा; 
यदि मुझ शस्त्ररहित एवं सामना न करने वाले को शस्त्रधारी धृतराष्ट्र के पुत्र रण में मार डालें तो वह मारना भी मेरे लिये अधिक कल्याणकारक ही होगा ।।१।४६।।शस्त्रविहीन अप्रतीकारी भी हूँ, कौरव सशस्त्र भरे सारे। 
मरना भी श्रेयस्कर होगा, धृतराष्ट्र तनय यदि मुझे मारे।‌।१।४६।।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 045-01-045(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यता: ।।१।४५।।
अहो = ओह; बत = कितना आश्चर्य है; महत्पापम् = महान् पाप; कर्तुम् = करने को; व्यवसिता: = तैयार हुए हैं;वयम् = हम लोग; (यद्राज्यसुखलोभेन = यत्+राज्यसुखलोभेन); यत् = जो कि; राज्यसुखलोभेन =राज्य और सुख के लोभ से; हन्तुम् = मारने के लिये; स्वजनम् = अपने कुल को; उद्यता: = उद्यत हुए हैं।
ओह ! कितना आश्चर्य है कि हम लोग बुद्धिमान होकर भी महान् पाप करने को तैयार हो गये हैं, जो राज्य तथा सुख के लोभ से स्वजनों को मारने के लिये उद्यत हो गये हैं ।।१।४५।।
ओह!घोर अचरज है कि हम प्रहार को उद्धत खड़ें,
राज्य सुख हित स्वजनों के प्राण लेने को बढ़ें ।
समझ भी है हमें पर कार्य यह अनुचित करें ?
स्वजनों को मारने से लगता हे माधव पाप बड़े ।।१।४५।।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 043-01-043(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

दोषैरेतै: कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकै:। 
उत्साद्यन्ते जातिधर्मा: कुलधर्माश्च शाश्वता: ।।१।४३।।
(दोषैरेतै: =दोषै:+ एतै); दोषै: =दोषों से; एतै: = इन; कुलघ्नानाम् = कुल घातियों के; वर्णसंकरकारकै: = वर्णसंकरकारक; उत्साद्यन्ते = नष्ट हो जातेहैं;जातिधर्मा: = जातिधर्म; (कुलधर्माश्च =कुलधर्म:+च); कुलधर्म: =कुलधर्म; च = और; शाश्वता: = सनातन।
इन वर्णसंकरकारक दोषों के कारण कुलघातियों के सनातन कुल-धर्म और जाति-धर्म नष्ट हो जाते हैं ।।१।४३।।कुलधर्म सनातन मिट जाता है इन वर्णसंकर कारक दोष से। 
जाति-धर्म कहाँ टिक पाता है इन कुलघातियों के दोष से ।।१।४३।।

हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 042-01-042(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च । 
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रिया: ।।१।४२।।
संकर: = वर्णसंकर; च =और; कुलस्य = कुल को; (नरकायैव =निकाय+एव); नरकाय = नरक में ले जाने के लिये; एव = ही; कुलघ्रानाम् = कुल घातियों को;कुलस्य = कुल का; च =और;पतन्ति =गिर जाते हैं;पितर: = पितरलोग; (ह्येषां =हि+एषाम् ); हि = भी; एषाम् = इनके; लुप्तपिण्डोदकक्रिया: = लोप हुई पिण्ड और जल की क्रिया वाले।
वर्णसंकर कुलघातियों को तथा कुल को नरक में ले जाने के लिये ही होता है। लुप्त हुई पिण्ड और जल की क्रिया वाले अर्थात् श्राद्ध और तर्पण से वंचित इनके पितर लोग भी अधोगति को प्राप्त होते हैं ।।१।४२।।
कुल और कुलघातियों को नरक देने को प्रभो!
वर्णसंकर जन्म लेते इसी कारण हे अखिल विभो!
वर्णसंकर से पितृगण श्राद्ध नहीं पा सकते हैं।
तर्पणहीन हो ये पितृगण नरकवास पा जाते हैं।।१।४२।।
हरि ॐ तत्सत्।
श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 040-01-040(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्मा: सनातना:। 
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ।।१।४०।। 
कुलक्षये =कुल के नाश होने से; प्रणश्यन्ति = नष्ट हो जाते हैं; कुलधर्मा: = कुलधर्म; सनातना: = सनातन; धर्मे नष्टे = धर्म के नाश होने से;कुलं = कुल; (कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत = कृत्स्नम्+अधर्म:+अभिभवति+उत) कृत्स्नम् = संपूर्ण; अधर्म: = पाप; अभिभवति = बहुत बढ़ जाता है;उत = भी । 
कुल के नाश हो जाने से सनातन कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं, धर्म के नाश हो जाने पर सम्पूर्ण कुल में पाप भी बहुत बढ़ जाता है ।।१।४०।
कुल नष्ट होने पर कुलधर्म सनातन मिट जाता है। 
धर्म विनष्ट हुआ ज्यों ही तो पाप बहुत बढ़ जाता है।‌।१।४०।।

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 038/039-01-038/039(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतस: ।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ।।१।३८।।
कथं न ज्ञेयमस्माभि: पापादस्मान्निवर्तितुम् ।कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ।।१।३९।।
(यद्यप्येते = यदि+अपि+ते); यदि = यदि; अपि = भी; एते = ये; न = नहीं; पश्यन्ती = देखते हैं; (लोभोपहतचेतस: = लोभ+उपहत+चेतस: ); लोभ =लोभ; उपहत= अभिभूत; चेतस: = चित्त वाले; (कुलक्षयकृतम् = कुल +क्षय +कृतम्); कुल = कुल; क्षय = नाश; कृतम् = किया हुआ;
दोषम् = दोष को; मित्रद्रोहे = मित्रों के साथ विरोध करने में; पातकम् = पापको;कथम् = क्यों; न =नहीं; ( ज्ञेयमस्माभि: = ज्ञेयम्+अस्माभि: ); ज्ञेयम् = विचार करना चाहिए; अस्माभि: = हम लोगों को;( पापादस्मान्निवर्तितुम् =पापात् +अस्मान्+निवर्तितुम् ); पापात् =पाप से; अस्मान् = हमलोगों को; निवर्तितुम् = बचने के लिये; कुलक्षयकृतम् = कुल के नाश करने से किए गए; दोषम् = दोष ( प्रपश्यद्भिर्जनार्दन = प्रपश्यद्भि:+ जनार्दन); प्रपश्यभ्दि: = जानने वालों के द्वारा; जनार्दन = हे जनार्दन (श्री कृष्ण)!
यद्यपि लोभ से अभिभूत होकर ये लोग कुल के नाश से उत्पन्न दोष को और मित्रों के साथ विरोध करने में किए गए पाप को नहीं देखते, तो भी हे जनार्दन ! कुल के नाश से उत्पन्न दोष को जानने वाले हम लोगों को इस पाप से बचने के लिए क्यों नहीं विचार करना चाहिए ।।१।३८-३९।।
ये मित्र द्रोही लोभ के वश, कुल नाश करने को खड़े।
मित्र द्रोह परम दोष है, कुलक्षयी को लगेंगे पाप बड़े।।
हम जानते कुल नाश से , क्या दोष लगता है प्रभु!
हमें ज्ञात है यह पाप है, बचें न क्यों हे अखिल विभू।।१।३८-३९।।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 037-01-037(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान् ।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिन: स्याम माधव ।।१।३७।।
( तस्मान्नार्हा =तस्मात्+न+आर्हा );तस्मात् = इससे; न अर्हा: = योग्य नहीं हैं; वयम् =हम ; हन्तुम् = मारने के लिये; (धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान् = धार्तराष्ट्रान् +स्वबान्धवान् ); धार्तराष्ट्रान् =धृतराष्ट्र के पुत्रों को; स्वबान्धवान् = अपने बंधुओं; स्वजनम् = अपने कुटुम्बको; हि =क्योंकि; कथम् = कैसे; हत्वा = मारकर; सुखिन: = सुखी; स्याम =होंगे; माधव =हे माधव ।
अतएव हे माधव! अपने ही बन्धु धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारने के लिये हम योग्य नहीं हैं, क्योंकि अपने ही बन्धुओं को मारकर हम कैसे सुखी होंगे ? ।।१।३७।।
हे माधव!नहीं हम योग्य हैं, मारूं धार्तराष्ट्रों को यहाँ ।
स्वजनों को ही मारकर,हम होंगे सुखी माधव! कहाँ।।१।३७।।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 036-01-036(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

निहत्य धार्तराष्ट्रान्न: का प्रीतिस्याज्जनार्दन ।
पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिन: ।१।३६।।
निहत्य = मारकर (भी);( धार्तराष्ट्रान्न: = धार्तराष्ट्रान् +न: ) धार्तराष्ट्रान् = धृतराष्ट्र के पुत्रों के;न: = हमें; का =क्या; ( प्रीतिस्याज्जनार्दन = प्रीति:+स्यात्+जनार्दन,)प्रीति: = प्रसन्नता; स्यात् = होगी; जनार्दन: = जनों के दी:ख हरने वाले; (पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिन: = पापम्+एव+आश्रयेत्+अस्मान्+हत्वा+एतान् आततायिन: ); पापम् = पाप; एव = ही; आश्रयेत् =लगेगा; अस्मान् = हमें; हत्वा = मारकर; एतान् = इन; आततायिन: = आततायियों को ।
हे जनार्दन! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारकर तो हमें पाप ही लगेगा ।।१।३६।।
हे जनार्दन! होगी खुशी क्या हमें धृतराष्ट्र सुतों को मारकर।
क्या न होगा पाप अवश्य ही इन आततायियों को संहार कर ।।१।३६।।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'

शनिवार, 24 फ़रवरी 2024

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 033/034/035-01-033/034/035(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगा: सुखानि च ।
ते इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ।।१।३३।।
आचार्या: पितर: पुत्रास्तथैव च पितामहा: ।
मातुला: श्वशुरा: पौत्रा श्याला: सम्बंधिनस्तथा ।।१।३४।।
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन ।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतो: किं नु महीकृते।।१।३५।।
(येषामर्थे = येषाम्+अर्थे); येषाम् = जिनके; अर्थे = लिये; काॾ.क्षितम् = इच्छित हैं; न:=हमारा;राज्यम्=राज्य; भोगा: = भोग; सुखानि = सुख; च = और; ते = वे (ही); इमे = यह सब; अवस्थिता: = खड़े हैं; युद्धे = युद्ध में;(प्राणांस्त्यक्त्वा =प्राणान् +त्यक्त्वा); प्राणान् = जीवन (की आशा) को; त्यक्त्वा =त्यागकर; धनानि = धन; आचार्या: = गुरुजन; पितर: = पितृगण; पुत्रा: = पुत्रगण; (पुत्रास्तथैव = पुत्रा:+तथा+एव); पुत्रा: = पुत्र; तथा = वैसे; एव = निश्चय ही; च = भी; पितामहा: = दादा; मातुला: = मामा; श्वशुरा: = ससुर; पौत्रा: = पोते;श्याला:=साले;(सम्बंधिनस्तथा = सम्बंधिन:+तथा); सम्बन्धिन: = सम्बन्धी लोग; तथा = और; एतान् =इन सबको; न: = हमारा (एतान्न = एतान्+न); हन्तुम् =मारना; इच्छामि = चाहता हूँ;(हन्तुमिच्छामि = हन्तुम्+ इच्छामि): (घ्नतोपि=घ्नत:+अपि); घ्नत:; = मारे जाने पर; अपि = भी; मधुसूदन = मधु राक्षस को मारनेवाले श्री कृष्ण!, त्रैलोक्यराज्यस्य = तीनों लोकों के राज्य के; हेतो: = के लिए; महीकृते = पृथिवी के लिये ; नु किम् = कहना ही क्या है।
हम जिनके लिये राज्य, भोग और सुख चाहते हैं, वे ही ये सब धन और जीवन की आशा को त्याग कर युद्ध में खड़े हैं ।।१‌।३३।।।
गुरुजन, पितृगण, पुत्रगण,और उसी प्रकार पितामह, मामा लोग, ससुर, पौत्र, सालें तथा अन्य भी सम्बन्धी लोग हैं ।।१।३४।
हे मधुसूदन! मुझे मारने पर भी अथवा तीनों लोकों के राज्य के लिये भी मै इन सबको मारना नहीं चाहता, फिर पृथ्वी के लिये तो कहना ही क्या है ? ।।१।३५।।
जिनके लिए मैं चाहता राज्य सुख और भोग को।
प्राण धन की आस छोड़ें, रण में खड़े वे योग को।।१।३३।।
पिता पुत्र और गुरु पितामह रण-आंगन में खड़े।
मामा ससुर और पौत्र सालें अन्य सम्बन्धी बड़े।।१।३४।।
हे नाथ! त्रिलोक के राज्य हित न मारता, मारें मुझे।
मही सुख अति तुच्छ है, संघारना क्यों बिन बुझे।।१।३५।।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 032-01-032(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)


न काड्.क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च ।
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ।।१।३२।।
न = नहीं; काड्.क्षे = चाहता हूँ; विजयम् = विजय को; कृष्ण = हे कृष्ण; च = और; राज्यम् = राज्य; सुखानि =सुखों को; गोविन्द = हे गोविन्द; न: = हमें; राज्येन = राज्य से; किम् = क्या ; भोगै: = भोगों से; जीवितेन =जीवन से; किम् = क्या; वा = अथवा।
हे कृष्ण! न तो मैं विजय चाहता हूँ और न ही राज्य तथा सुखों को ही। हे गोविन्द ! हमें ऐसे राज्य से क्या प्रयोजन है अथवा ऐसे भोगों से और जीवन से भी क्या लाभ है? ।।१।३२।।
हे कृष्ण! विजय नहीं चाहता, न राज्य सुख की चाह है।
जीवन राज्य भोग व्यर्थ हैं, ज्यों स्वजनों की आह है।।१।३२।।
हरि ॐ तत्सत् ‌।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'

शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2024

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 031-01-031(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ।।१।३१।।
निमित्तानि = लक्षणों को; च = और,भी; पश्यामि =देखता हूं; विपरीतानि = विपरीत; केशव = हे कृष्ण (हे केशी असुर को मारने वाले);न = नहीं; च = भी; और; (श्रेयोऽनुपश्यामि = श्रेय: + अनुपश्यामि); श्रेय: = कल्याण ; अनुपश्यामि = पहले से देख रहा हूंँ ; हत्वा = मारकर; स्वजनम् = अपने सगे-संबंधियों को; आहवे = युद्व में; ।
हे केशव ! मैं लक्षणों को भी विपरीत ही देख रहा हूँ तथा युद्ध में अपने सगे-संबंधियों को मारकर कल्याण भी पहले से ही नहीं देख पा रहा हूँ।।१।३१।।
लक्षण विपरीत हैं दिखते, हे केशव! इसे पहचानता ।
स्वजनों को मारकर, नहीं कल्याण पूर्व ही जानता।।१।३१।।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 030-01-030(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

 
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मन: ।।१।।३०।।
गाण्डीवम् = गाण्डीव धनुष; स्रंसते =गिरता है; (हस्तात्त्वक्चैव =हस्तात्+त्वक्+च+एवं); हस्तात् = हाथ से ; च =और; त्वक् = त्वचा; एव =भी; परिदह्यते = बहुत जलती है; न=नहीं ;च=और ; ( शक्नोम्यवस्थातुम् = शक्नोमि +अवस्थातुम् ) ; शक्नोमि = समर्थ ;अवस्थातुम् = खड़ा रहने को; भ्रमति इव =भ्रमित सा हो रहा है; में=मेरा; मन: = मन ।
हाथ से गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी बहुत जल रही है तथा मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है, इसलिये मैं खड़ा रहने को भी समर्थ नहीं हूँ ।।१।।३०।।
गाण्डीव जैसे धनुष मेरे, हस्त गिरते, त्वचा मेरी जल रही है।
मन भ्रमित-सा , असमर्थ स्थित, दशा अजब -सी हो रही है।।१।३०।।
हरि ॐ तत्सत्।
श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'

मंगलवार, 20 फ़रवरी 2024

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 028/029-01-028/029(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

अर्जुन उवाच -
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्णं युयुत्सुं समुपस्थितम् ।।१।२८।। 
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति । 
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ।।१।२९।।
कृष्ण =हे कृष्ण; इमम् =इस; युयुत्सुम् = युद्व की इच्छा वाले; समुपस्थितम् =खड़े हुए; स्वजनम् = स्वजन समुदाय को; द्रष्टा= देखकर; मम = मेरे; गात्राणि =अंग; सीदन्ति = शिथिल हुए जाते हैं; च = और; मुखम् =मुख (भी); परिशुष्यति = सूखा जाता है; च = और; मे = मेरे; शरीरे =शरीर में; वेपथु: =कम्प; च = तथा; रोमहर्ष: =रोमांच; जायते = होता है।अर्जुन बोले- हे कृष्ण ! युद्ध क्षेत्र में डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इस स्वजन समुदाय को देखकर मेरे अंग शिथिल हुए जा रहे हैं और मुख सूखा जा रहा है तथा मेरे शरीर में कम्पन एवं रोमांच हो रहा है ।।१।।२८ -२९।।
रणोत्सुक देख इन बांधवों को ,अंग शिथिल से, कृष्ण मेरे हो रहे हैं। 
मुख सूख रहे हैं, तन में मेरे रोमांच कंपन ,अजब कैसे हो रहे हैं।।१।।२८-२९।।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 027-01-027(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

तत्रापश्यत्स्थितान्‌ पार्थः पितॄनथ पितामहान्‌ ।
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ।।१।२७।।
तान् = उन्हें ; समीक्ष्य = देखकर ; स: = वह ; कौन्तेय: = कुन्ती का पुत्र (अर्जुन) ; (सर्वान्बन्धूनवस्थितान् = सर्वान्+बन्धून्+अवस्थितान्) ; सर्वान् = सभी को ; बन्धून् = संबन्धियों को ; अवस्थितान् = स्थित ; कृपया = दया (करुणा)से ; परया = अत्यधिक ; आविष्ट: = घिर गया ;(परयाविष्टो = परया + आविष्टो) ; ( विषीदन्निदमब्रवीत् = विषीदन्+इदम्+अब्रवीत् ) ; विषीदन् = शोक करता हुआ ; इदम् = यह ; अब्रवीत् = बोला ।
कुन्तीपुत्र अर्जुन ने जब अपने सभी संबन्धियों को वहां इस प्रकार स्थित देखा तो वह दया और करुणा से घिर गया और शोक करते हुए इस प्रकार बोला।
अर्जुन ने जब देखा बांधव, सगे- सम्बन्धी खड़े रण में।
बोला करुणा दया से घिर कर, शोक विकल बड़े मन में।।
१।२७।।

तान्समीक्ष्य स कौन्तेय सर्वान्बन्धूनवस्थितान्।

हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'



श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 026-01-026(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ॥
श्वशुरान्‌ सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।।१।२६।।(तत्रापश्यत्स्थितान्‌ = तत्र+अपश्यत्+स्थितान् ) ; तत्र = वहां ; अपश्यत् = देखा ; स्थितान् = खड़े ; पार्थ: = अर्जुन ; पितॄनथ् = पितरों को(चाचा, ताऊ आदि) ; पितामहान् = पितामहों को ; आचार्यान् = गुरुओं को ; मातुलान् = मामाओं को ; भ्रातृन् = भाइयों को ; पुत्रान् = पुत्रों को ; पौत्रान् = पोतों को ; सखीं = मित्रों को ; तथा = और ; श्वशुरान् = ससुरों को ; ( सुहृदश्चैव = सुहृद:+च+एव ) ; सुहृद: = शुभचिंतकों को ; च = और ; एव = निश्चय ही ; सेनयो: = दोनों सेनाओं के ; उभयो: = दोनों पक्षों के ; अपि = भी ।
वहां पार्थ ने अनेक पितरों (चाचा, ताऊ आदि), पितामहों,गुरुओं, मामाओं, भाइयों,पुत्रों, पौत्रों, मित्रों, श्वसुरों और शुभचिंतकों को युद्धभूमि में दोनों पक्षों की सेनाओं में युद्ध करने हेतु एकत्रित देखा।।१।२६।।
वहां पार्थ ने रण में देखा, पितर पितामह खड़े बड़े।
गुरु मामा भाई पुत्र सब, पौत्र मित्र भी भरे हुए।।
अनेक श्वसुर भी लड़ने आए, मरने को तैयार खड़े।
हितचिंतक नहीं हटने वाले,यम से भी जो नहीं डरे।।१।।२६।।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'





सोमवार, 19 फ़रवरी 2024

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 025-01-025(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्।
उवाच पार्थपश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति।।१।२५।।
भीष्म: =भीष्म पितामह ; द्रोण = द्रोणाचार्य ; प्रमुखत: = सामने,समक्ष ; सर्वेषां = सबों के ; च =और ; महीक्षिताम् = संपूर्ण धरती (राजा) के राजा ; उवाच = कहा ; पार्थ = अर्जुन (पृथा का पुत्र) ; (पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति = पश्य+एतान्+समवेतान्+कुरून्+इति) ; पश्य = देखो ; एतान् = इन सबों को ; समवेतान् = एकत्रित ; कुरून् = कुरुवंशियों को ; इति = इस प्रकार ।पितामह भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य और समस्त संसार के राजाओं के समक्ष भगवान श्रीकृष्ण ने इस प्रकार कहा कि हे पार्थ! यहां एकत्रित इन कुरुवंशियों को देखो‌।।१।२५।।
भीष्म महीप द्रोण समक्ष, प्रभु ने ऐसे वचन कहे।
देखो पार्थ इन वीरों को, कुरु-कुल के हैं नाम बड़े ।।१।२५।।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'




श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 024-01-024(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

संजय उवाच
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्।।१।२४।।
संजय: = संजय ने ; उवाच = कहा ; (एवमुक्त: = एवम्+उक्त:) ; एवम् = इस प्रकार ; उक्त: = कहे गए ; हृषीकेश: = अन्तर्यामी भगवान श्रीकृष्ण ; गुडाकेशेन = गुडाकेश के द्वारा (नींद पर विजय प्राप्त करने वाला अथवा घुंघराले बालों वाला गुडाकेश कहलाता है। अर्जुन में ये दोनों गुण थे।) ; भारत = हे भरतवंशी! (धृतराष्ट्र के लिए प्रयुक्त किया गया है) ; (सेनयोरुभयोर्मध्ये = सेनयो:+उभयो:+मध्ये) ; सेनयो: = दोनों सेनाओं के ; उभयो: = दोनों ; मध्ये = बीच में ; स्थापयित्वा = रोककर ; (रथोत्तमम् = रथ: + उत्तमम्) ; रथ: = रथ ; उत्तमम् = उत्तम ।
संजय ने कहा-
हे भरतवंशी! (धृतराष्ट्र) गुडाकेश अर्जुन के द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर अन्तर्यामी भगवान श्रीकृष्ण ने उस उत्तम रथ को दोनों सेनाओं के मध्य में लाकर खड़ा कर दिया।।१।२४।।
भारत!गुडाकेश अर्जुन ने, जब हरि से ऐसे वचन कहे।
सुनकर प्रभु उत्तम रथ लेकर, सैन्य-मध्य वे खड़े रहे।।१।२४।।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'





श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 023-01-023(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः।।१।२३।‌।
( योत्स्यमानानवेक्षेऽहं = योत्स्यमानान् + अवेक्षे + अहम् )
योत्स्यमानान् = युद्ध करने वाले को; = देख लूं ; अहम् = मैं; य: = जो; (एतेऽत्र = एते+अत्र); एते=वे; अत्र=यहां; समागता:=एकत्रित; धार्तराष्ट्रस्य=धृतराष्ट्र के पुत्रों के; (दुर्बुद्धेर्युद्धे = दुर्बुद्धे:+युद्धे); दुर्बुद्धे: = दुर्बुद्धि; युद्धे = युद्ध में; प्रिय = भला, मंगल; चिकीर्षवः = चाहने वाले।
मुझे उन लोगों को देख लेने दीजिए जो धृतराष्ट्र के दुर्बुद्धि-पुत्र दुर्योधन को प्रसन्न करने हेतु इस रणभूमि में एकत्रित हुए हैं।।१।२३।।
देख लूं मैं उन्हें पलक भर ,रण को उत्सुक हैं यहां।
दुर्बुद्धे दुर्योधन के हित, मरने को हैं खड़े जहां।।१।२३।‌।
हरि ॐ तत्सत्।
श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'