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शुक्रवार, 16 फ़रवरी 2024

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 013-01-013(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत्।।१।१३।। 
तत: = उसके बाद ; ( शङखाश्च = शङखा: + च ) ; शङखा: = बहुत-से शंख ; ( भेर्यश्च = भेर्य: + च ) ; भेर्य : = बड़े-बड़े ढ़ोल, नगाड़े ; ( पणवानक = पणव + आनक ) ; पणव = ढ़ोल ; आनक = मृदंग ; गोमुख: = श्रृंगी ; ( सहसैवाभ्यहन्यन्त = सहसा + एव +अभ्यहन्यन्त ) ; सहसा = अचानक ; एव = निश्चय ही ; अभ्यहन्यन्त = एकसाथ बजाए गए ; स: = ( शब्दस्तुमुलोऽभवत् = शब्द: + तुमुल: + अभवत् ) ; शब्द: = समवेत स्वर ; तुमुल: = ; कोलाहलपूर्ण ; अभवत् = हुआ। 
उसके बाद अनेक शंख, बडे़-बड़े ढ़ोल- नगाड़े, बिगुल, तुरही और सींग अचानक ही एक साथ बज उठे। वह समवेत स्वर अत्यंत कोलाहलपूर्ण था। 
तभी शंख बिगुल मृदंग तुरही, नगाड़े श्रृंगी बज उठे। 
समवेत स्वर से गुंजी धरती, अतीव कोलाहल हुए।।१।१३।।

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 012-01-012(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)


तस्य संजनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान्।।१।१२।।
तस्य = उसका ; संजनयन् = बढ़ाते हुए ; हर्षं = हर्ष ; कुरुवृद्ध : = कुरुवंश के वयोवृद्ध ; पितामह = दादा ; सिंहनादं = सिंह के समान गर्जना ; ( विनद्योच्चै: = विनद्य + उच्चै: ); विनद्य = गरजकर ; उच्चै: = जोर से ; शङ्खं = शंख ; दध्मौ = बजाया ; प्रतापवान् = बलशाली।
तभी कुरुवंशियों के वयोवृद्ध परम प्रतापी पितामह भीष्म ने सिंह के समान गर्जना करने वाले अपने शंख को जोर से बजाया जिसे सुनकर दुर्योधन को अपार हर्ष हुआ।
प्रतापी पितामह भीष्मवर ने, शंख बजाया अति जोर से।
शंख-ध्वनि सिंहनाद सुनकर, दुर्योधन खुश हैं शोर से ।।१।१२।।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 011-01-011(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि।।१।११।।
अयनेषु = मोर्चों पर ; च = और ; सर्वेषु = सभी ; ( यथाभागमवस्थिताः = यथा + भागम् + अवस्थिता: ) ; यथाभागमवस्थिताः = अपने-अपने स्थानों पर स्थित रहकर ; (भीष्ममेवाभिरक्षन्तु = भीष्मम् + एव + रक्षन्तु ) ; भीष्मम् = पितामह भीष्म की ; = निश्चय ही ; रक्षन्तु = सहायता करनी चाहिए ; भवन्त: = आप सभी ; सर्वे = सभी लोग ; एव हि = निश्चय ही।
आप सभी अपने-अपने मोर्चों पर स्थित रहकर निश्चित रूप से पितामह भीष्म की ही सहायता करें।।१।११।‌
सभी अयनों पर अडिग होकर, आप सभी संग्राम करें।
पितामह को सहयोग करें, निश्चय ही अविराम करें ।।१।११।।।

गुरुवार, 15 फ़रवरी 2024

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 010-01-010(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

अपर्याप्तं तदस्माकं बलंभीष्माभिरक्षितम्।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्।।१।१०।।
अपर्याप्तं = अपरिमेय ; ( तदस्माकं = तत् + अस्माकं ) ; तत् = वह ; अस्माकं = हमारी, हमलोगों की ; बलं = बल, सेना ; भीष्माभिरक्षितम् ( भीष्म + अभिरक्षितम् ) पितामह भीष्म द्वारा संरक्षित ; पर्याप्तं = सीमित ; ( त्विदमेतेषां = तु + इदम् + एतेषाम् ) ; तु = लेकिन ; इदम् =यह ; एतेषाम् = इनके ( पाण्डवों के) ; भीमाभिरक्षितम् ( भीम + अभिरक्षितम् ) भीम द्वारा संरक्षित।
हमारी सेना पितामह भीष्म द्वारा संरक्षित होकर अजेय अपरिमेय हैं लेकिन भीम द्वारा संरक्षित पाण्डवों की सेना सीमित है जो आसानी से जीता जा सकता है।
पितामहरक्षित कौरव बल है, अपनी सेना अजेय है।
भीमरक्षित पाण्डु -दल हैं, सीमित सुगम वो जेय है।।१।१०।।

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 009-01-009(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)


अन्ये च बहव: शूरा मदर्थे त्यक्तजीविता: ।
नानाशस्त्रप्रहरणा: सर्वे युद्धविशारदा: ।।१।९।।
अन्ये = अन्य; च और; बहव: = बहुत से; शूरा: = शूरवीर; मदर्थें = मेरे लिये; त्यक्तजीविता: = जीवन की आशा को त्यागने वाले; नानाशस्त्रप्रहरणा: = अनेक प्रकार के शस्त्र अस्त्रों से युक्त; सर्वें = सब के सब; युद्वविशारदा: = युद्ध में चतुर हैं।
और भी मेरे लिये जीवन की आशा त्याग देने वाले बहुत-से शूरवीर अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित और सभी युद्ध में चतुर हैं ।।१।९।।
मरने को तैयार रण में मेरे हित सब वीर हैं।
आयुधों से युक्त भी हैं, समर चतुर रणधीर हैं।।।।१।९।।
हरि ॐ तत्सत्।
श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य 

बुधवार, 14 फ़रवरी 2024

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 008-01-008(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)


भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च।।१।।८।।
भवान् = आप ; (भीष्मश्च = भीष्म: + च ) ; भीष्म: = भीष्म पितामह ; ( कर्णश्च = कर्ण: + च ) ; कर्ण: = कर्ण ; ( कृपश्च = कृप: + च ) ; कृप: = कृपाचार्य ; समितिञ्जयः = सदा संग्राम में विजयी ; = अश्वत्थामा ; (द्रोणाचार्य का पुत्र ) ; ( विकर्णश्च = विकर्ण: + च ) ; विकर्ण: = विकर्ण ; ( सौमदत्तिस्तथैव‌ = सोमदत्ति: + तथा + एव ) ; सौमदत्ति: = सोमदत्त का पुत्र ; एव = निश्चय ही।
मेरी सेना में स्वयं आप, भीष्म पितामह, कर्ण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, विकर्ण तथा सोमदत्त के पुत्र भूरिश्रवा हैं - जो सभी सदा संग्राम विजयी रहे हैं।
मेरे दल में आप भी हैं,भीष्म कृपा और कर्ण हैं।
संग्राम भूमि में सदा विजयी, अश्वत्थ भूरि विकर्ण हैं।।१।८।।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 007-01-007(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)


अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम।
नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते।।१।७।।
अस्माकं = हमलोगों के, हमारे ; तु = लेकिन ; विशिष्टा : = विशेष शक्तिशाली ; ये = जो ;( तान्निबोध = तान् + निबोध ) ; तान् = उन्हें ; निबोध = समझ लीजिए ; ( द्विजोत्तम = द्विज +उत्तम ) ; द्विज = हे ब्रह्मण ; उत्तम = श्रेष्ठ ; नायका = नायका : = सेनापति ; मम् = मेरे ; सैन्यस्य = सेना के ; संज्ञार्थं(संज्ञा+अर्थं) = जानकारी के लिए ; तान् = उन्हें ; ब्रवीमि = बताता हूं ; ते = आपको।
हे ब्राह्मण श्रेष्ठ! लेकिन अब हमारे जो विशेष शक्तिशाली वीर योद्धा हैं, उन्हें आप समझ लीजिए। वे सभी हमारी सेना के संचालन करने में सक्षम हैं, उन्हें आपको जानकारी के लिए बताता हूं।
हे द्विजश्रेष्ठ ! अपने समर के विशिष्ट योद्धा जान लें।
सैन्य-संचालन निपुण हैं, कह रहा आप संज्ञान लें।‌‌।१।७।।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'