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शनिवार, 17 फ़रवरी 2024

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 019-01-019(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)


स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलोऽभ्यनुनादयन्।।१।१९।।
स: = वह(उस) ; घोष: = शब्द ; धार्तराष्ट्राणां = धृतराष्ट्र के पुत्रों के ; हृदयानि = हृदय को ; व्यदारयत् = विदीर्ण कर दिया ; ( नभश्च = नमः + च ) ; नभ: = आकाश ; पृथिवीं = धरती ; (चैव = च + एव ) ; च = और ; एव = निश्चय ही ; तुमुल: = कोलाहलपूर्ण ; अभ्यनुनादयन् = प्रति ध्वनित करता हुआ।
उन सभी की ध्वनि मिलकर कोलाहलपूर्ण बन गई जो आकाश और धरती को प्रतिध्वनित करते हुए धृतराष्ट्र के पुत्रों के हृदय को विदीर्ण कर दिया, अर्थात् उनमें भय उत्पन्न कर दिया।।१।१९।।
तुमुल वाद्य वो शंखध्वनि से, धरा गगन बीच शोर हुआ।
फट गई छाती धार्तराष्ट्र के, भय अमिट कमजोर हुआ।।१।१९।।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'





श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 016/017/018-01-016/017/018(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

 
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ।।१।१६।।
काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः।।१।१७।।
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते।
सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक्पृथक्।।१।१८।।
अनंतविजयं = अनंतविजय नामक शंख को ( युधिष्ठिर के शंख का नाम ) ; कुन्तीपुत्र: = कुन्तीपुत्र ; युधिष्ठिर : = युधिष्ठिर ; नकुल: = नकुल ; ( सहदेवश्च = सहदेव: + च ) ; सहदेव: = सहदेव ; च = और ; सुघोष: = सुघोष नामक शंख ( नकुल के शंख का नाम ) ; मणिपुष्पक: = मणिपुष्पक नामक शंख ( सहदेव के शंख का नाम ) ;( काश्यश्च = काश्य: + च ) ; काश्य: = काशी के राजा ; च = और ; ( परमेष्वास: = परम + इषु + आस: ) ; परमेष्वास: = महान् धनुर्धर ; शिखण्डी = शिखण्डी ; महारथ: = महान् योद्धा ; धृष्टद्युम्न: = धृष्टद्युम्न ( राजा द्रुपद का पुत्र ) ; ( विराटश्च = विराट: + च ) ; विराट = राजा विराट ;
( सात्यकिश्चापराजितः = सात्यकि: + च + अपराजित: )सात्यकि: = सात्यकि ( भगवान श्रीकृष्ण के साथी ) ; अपराजित: = सदा विजयी , न हारने वाले ;
द्रुपद: = राजा द्रुपद ; ( द्रौपदेयाश्च = द्रौपदेया: + च ) ; द्रौपदेया: = द्रौपदी के पुत्र ; सर्वश: = सभी ; पृथ्वीपते = हे राजन् !;( सौभद्रश्च = सौभद्र: + च ) ; सौभद्र: = सुभद्रा के पुत्र अभिमन्यु ; महाबाहुः = महाबाहु, विशाल भुजाओं वाले ; ( शङ्खान्दध्मुः = शङ्खान् + दध्मु: ) ; शञ्खान् = शंखों ; दध्मु: = बजाया ;पृथक्पृथक् = अलग-अलग।
कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनंतविजय नामक अपने शंख को बजाया। नकुल और सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक नामक अपने-अपने शंख को बजाया।।१।१६।।
महान् धनुर्धर काशिराज तथा महान् योद्धा शिखण्डी, धृष्टद्युम्न, राजा विराट और अजेय सात्यकि ने भी अपने-अपने शंख को बजाया।।११७।।
हे राजन्! राजा द्रुपद और द्रौपदी के सभी पुत्र तथा सुभद्रापुत्र महाबाहु अभिमन्यु ने अलग-अलग अपने-अपने शंख को जोर से बजाया।।१।१८।।
अनंतविजय की ध्वनि सुनाकर, युधिष्ठिर वर वीर उद्घोष किया।
सुघोष-वो-मणिपुष्पक के संग, नकुल सहदेव जयघोष किया।।१।१६।।
काशिराज पधारे परम धनुर्धर , शिखण्डी महारथी बलशाली।
सात्यकि अजेय धृष्टद्युम्न विराट ने, किए शंखध्वनि नादोंवाली।।१।१७।‌।
हे राजन्। राजा द्रुपद और द्रौपदी के पुत्र ने , अपने शंख बजाये हैं।
इस रणभूमि में महाबाहु सुभद्रा पुत्र ने, पृथक् ही शंख बजाये हैं।।१‌।१८।।

शुक्रवार, 16 फ़रवरी 2024

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 015-01-015(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनंजयः।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः।।१।१५।।
पाञ्चजन्यं = पाञ्चजन्य नामक शंख को( भगवान श्रीकृष्ण के शंख का नाम ) ; हृषीकेश: = अन्तर्यामी भगवान श्रीकृष्ण ; देवदत्तं = देवदत्त नामक शंख को (अर्जुन के शंख का नाम ) ; धनंजय: = अर्जुन ( धन को जीतने वाले ) ; पौण्ड्रं = पौण्ड्र नामक शंख को ( भीम के शंख का नाम ) ; दध्मौ = बजाया ; महाशङ्खं = विशाल शंख को ; भीमकर्मा = भयानक ( भीषण ) कर्म करने वाले ; वृकोदर: = वृकोदर, भीम ( भीम के पेट में वृक नामक अग्नि था जिसके कारण उसका भोजन शीघ्र ही पच जाता था और भूख लग जाती थी। )
हृषीकेश भगवान श्रीकृष्ण ने पाञ्चजन्य नामक शंख को बजाया और धनञ्जय अर्जुन ने देवदत्त नामक शंख को जोर से बजाया। तभी भीमकर्मा वृकोदर भीम ने अपने विशाल पौण्ड्र नामक शंख को बहुत जोर से बजाया।।१।१५।।
माधव ने अब पाञ्चजन्य को, देवदत्त को पार्थ बजा डाला।
भीमकर्मा वृकोदर भीम ने, शंख पौण्ड्र बजाया मतवाला।।१।१५।‌।

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 014-01-014(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः।।१।१४।।
तत: = तत्पश्चात, उसके बाद ; ( श्वेतैर्हयैर्युक्ते = श्वेतै: + हयै: + युक्ते ) ; श्वेतै: = श्वेत, सफेद ; हयै: = घोड़ें ; युक्ते = युक्त ; महति = विशाल ; स्यन्दने = रथ पर ; स्थितौ = स्थित होकर, सवार होकर ; माधव: = श्री कृष्ण ; ( पाण्डवश्चैव = पाण्डव: + च + एव ) ; पाण्डव: = पाण्डु के पुत्र ; च = और ; एव = निश्चय ही ; दिव्यौ = दिव्य ( द्विवचन )शङ्खौ = दोनों शंख ; प्रदध्मतु: = बजाये।
तत्पश्चात दूसरी ओर श्वेत घोड़ों से सुसज्जित विशाल रथ पर सवार होकर भगवान श्रीकृष्ण और पाण्डु-पुत्र अर्जुन ने अपने-अपने दिव्य शंख बजाये।
श्वेत तुरंग से युक्त रथ पर,श्रीकृष्ण-अर्जुन प्रकट हुए।
दोनों ने दिव्य शंख बजाये,तुमुल शब्द तब विकट हुए।।१।१४।।

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 013-01-013(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत्।।१।१३।। 
तत: = उसके बाद ; ( शङखाश्च = शङखा: + च ) ; शङखा: = बहुत-से शंख ; ( भेर्यश्च = भेर्य: + च ) ; भेर्य : = बड़े-बड़े ढ़ोल, नगाड़े ; ( पणवानक = पणव + आनक ) ; पणव = ढ़ोल ; आनक = मृदंग ; गोमुख: = श्रृंगी ; ( सहसैवाभ्यहन्यन्त = सहसा + एव +अभ्यहन्यन्त ) ; सहसा = अचानक ; एव = निश्चय ही ; अभ्यहन्यन्त = एकसाथ बजाए गए ; स: = ( शब्दस्तुमुलोऽभवत् = शब्द: + तुमुल: + अभवत् ) ; शब्द: = समवेत स्वर ; तुमुल: = ; कोलाहलपूर्ण ; अभवत् = हुआ। 
उसके बाद अनेक शंख, बडे़-बड़े ढ़ोल- नगाड़े, बिगुल, तुरही और सींग अचानक ही एक साथ बज उठे। वह समवेत स्वर अत्यंत कोलाहलपूर्ण था। 
तभी शंख बिगुल मृदंग तुरही, नगाड़े श्रृंगी बज उठे। 
समवेत स्वर से गुंजी धरती, अतीव कोलाहल हुए।।१।१३।।

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 012-01-012(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)


तस्य संजनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान्।।१।१२।।
तस्य = उसका ; संजनयन् = बढ़ाते हुए ; हर्षं = हर्ष ; कुरुवृद्ध : = कुरुवंश के वयोवृद्ध ; पितामह = दादा ; सिंहनादं = सिंह के समान गर्जना ; ( विनद्योच्चै: = विनद्य + उच्चै: ); विनद्य = गरजकर ; उच्चै: = जोर से ; शङ्खं = शंख ; दध्मौ = बजाया ; प्रतापवान् = बलशाली।
तभी कुरुवंशियों के वयोवृद्ध परम प्रतापी पितामह भीष्म ने सिंह के समान गर्जना करने वाले अपने शंख को जोर से बजाया जिसे सुनकर दुर्योधन को अपार हर्ष हुआ।
प्रतापी पितामह भीष्मवर ने, शंख बजाया अति जोर से।
शंख-ध्वनि सिंहनाद सुनकर, दुर्योधन खुश हैं शोर से ।।१।१२।।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 011-01-011(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि।।१।११।।
अयनेषु = मोर्चों पर ; च = और ; सर्वेषु = सभी ; ( यथाभागमवस्थिताः = यथा + भागम् + अवस्थिता: ) ; यथाभागमवस्थिताः = अपने-अपने स्थानों पर स्थित रहकर ; (भीष्ममेवाभिरक्षन्तु = भीष्मम् + एव + रक्षन्तु ) ; भीष्मम् = पितामह भीष्म की ; = निश्चय ही ; रक्षन्तु = सहायता करनी चाहिए ; भवन्त: = आप सभी ; सर्वे = सभी लोग ; एव हि = निश्चय ही।
आप सभी अपने-अपने मोर्चों पर स्थित रहकर निश्चित रूप से पितामह भीष्म की ही सहायता करें।।१।११।‌
सभी अयनों पर अडिग होकर, आप सभी संग्राम करें।
पितामह को सहयोग करें, निश्चय ही अविराम करें ।।१।११।।।