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मंगलवार, 20 फ़रवरी 2024

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 027-01-027(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

तत्रापश्यत्स्थितान्‌ पार्थः पितॄनथ पितामहान्‌ ।
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ।।१।२७।।
तान् = उन्हें ; समीक्ष्य = देखकर ; स: = वह ; कौन्तेय: = कुन्ती का पुत्र (अर्जुन) ; (सर्वान्बन्धूनवस्थितान् = सर्वान्+बन्धून्+अवस्थितान्) ; सर्वान् = सभी को ; बन्धून् = संबन्धियों को ; अवस्थितान् = स्थित ; कृपया = दया (करुणा)से ; परया = अत्यधिक ; आविष्ट: = घिर गया ;(परयाविष्टो = परया + आविष्टो) ; ( विषीदन्निदमब्रवीत् = विषीदन्+इदम्+अब्रवीत् ) ; विषीदन् = शोक करता हुआ ; इदम् = यह ; अब्रवीत् = बोला ।
कुन्तीपुत्र अर्जुन ने जब अपने सभी संबन्धियों को वहां इस प्रकार स्थित देखा तो वह दया और करुणा से घिर गया और शोक करते हुए इस प्रकार बोला।
अर्जुन ने जब देखा बांधव, सगे- सम्बन्धी खड़े रण में।
बोला करुणा दया से घिर कर, शोक विकल बड़े मन में।।
१।२७।।

तान्समीक्ष्य स कौन्तेय सर्वान्बन्धूनवस्थितान्।

हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'



श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 026-01-026(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ॥
श्वशुरान्‌ सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।।१।२६।।(तत्रापश्यत्स्थितान्‌ = तत्र+अपश्यत्+स्थितान् ) ; तत्र = वहां ; अपश्यत् = देखा ; स्थितान् = खड़े ; पार्थ: = अर्जुन ; पितॄनथ् = पितरों को(चाचा, ताऊ आदि) ; पितामहान् = पितामहों को ; आचार्यान् = गुरुओं को ; मातुलान् = मामाओं को ; भ्रातृन् = भाइयों को ; पुत्रान् = पुत्रों को ; पौत्रान् = पोतों को ; सखीं = मित्रों को ; तथा = और ; श्वशुरान् = ससुरों को ; ( सुहृदश्चैव = सुहृद:+च+एव ) ; सुहृद: = शुभचिंतकों को ; च = और ; एव = निश्चय ही ; सेनयो: = दोनों सेनाओं के ; उभयो: = दोनों पक्षों के ; अपि = भी ।
वहां पार्थ ने अनेक पितरों (चाचा, ताऊ आदि), पितामहों,गुरुओं, मामाओं, भाइयों,पुत्रों, पौत्रों, मित्रों, श्वसुरों और शुभचिंतकों को युद्धभूमि में दोनों पक्षों की सेनाओं में युद्ध करने हेतु एकत्रित देखा।।१।२६।।
वहां पार्थ ने रण में देखा, पितर पितामह खड़े बड़े।
गुरु मामा भाई पुत्र सब, पौत्र मित्र भी भरे हुए।।
अनेक श्वसुर भी लड़ने आए, मरने को तैयार खड़े।
हितचिंतक नहीं हटने वाले,यम से भी जो नहीं डरे।।१।।२६।।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'





सोमवार, 19 फ़रवरी 2024

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 025-01-025(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्।
उवाच पार्थपश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति।।१।२५।।
भीष्म: =भीष्म पितामह ; द्रोण = द्रोणाचार्य ; प्रमुखत: = सामने,समक्ष ; सर्वेषां = सबों के ; च =और ; महीक्षिताम् = संपूर्ण धरती (राजा) के राजा ; उवाच = कहा ; पार्थ = अर्जुन (पृथा का पुत्र) ; (पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति = पश्य+एतान्+समवेतान्+कुरून्+इति) ; पश्य = देखो ; एतान् = इन सबों को ; समवेतान् = एकत्रित ; कुरून् = कुरुवंशियों को ; इति = इस प्रकार ।पितामह भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य और समस्त संसार के राजाओं के समक्ष भगवान श्रीकृष्ण ने इस प्रकार कहा कि हे पार्थ! यहां एकत्रित इन कुरुवंशियों को देखो‌।।१।२५।।
भीष्म महीप द्रोण समक्ष, प्रभु ने ऐसे वचन कहे।
देखो पार्थ इन वीरों को, कुरु-कुल के हैं नाम बड़े ।।१।२५।।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'




श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 024-01-024(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

संजय उवाच
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्।।१।२४।।
संजय: = संजय ने ; उवाच = कहा ; (एवमुक्त: = एवम्+उक्त:) ; एवम् = इस प्रकार ; उक्त: = कहे गए ; हृषीकेश: = अन्तर्यामी भगवान श्रीकृष्ण ; गुडाकेशेन = गुडाकेश के द्वारा (नींद पर विजय प्राप्त करने वाला अथवा घुंघराले बालों वाला गुडाकेश कहलाता है। अर्जुन में ये दोनों गुण थे।) ; भारत = हे भरतवंशी! (धृतराष्ट्र के लिए प्रयुक्त किया गया है) ; (सेनयोरुभयोर्मध्ये = सेनयो:+उभयो:+मध्ये) ; सेनयो: = दोनों सेनाओं के ; उभयो: = दोनों ; मध्ये = बीच में ; स्थापयित्वा = रोककर ; (रथोत्तमम् = रथ: + उत्तमम्) ; रथ: = रथ ; उत्तमम् = उत्तम ।
संजय ने कहा-
हे भरतवंशी! (धृतराष्ट्र) गुडाकेश अर्जुन के द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर अन्तर्यामी भगवान श्रीकृष्ण ने उस उत्तम रथ को दोनों सेनाओं के मध्य में लाकर खड़ा कर दिया।।१।२४।।
भारत!गुडाकेश अर्जुन ने, जब हरि से ऐसे वचन कहे।
सुनकर प्रभु उत्तम रथ लेकर, सैन्य-मध्य वे खड़े रहे।।१।२४।।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'





श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 023-01-023(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः।।१।२३।‌।
( योत्स्यमानानवेक्षेऽहं = योत्स्यमानान् + अवेक्षे + अहम् )
योत्स्यमानान् = युद्ध करने वाले को; = देख लूं ; अहम् = मैं; य: = जो; (एतेऽत्र = एते+अत्र); एते=वे; अत्र=यहां; समागता:=एकत्रित; धार्तराष्ट्रस्य=धृतराष्ट्र के पुत्रों के; (दुर्बुद्धेर्युद्धे = दुर्बुद्धे:+युद्धे); दुर्बुद्धे: = दुर्बुद्धि; युद्धे = युद्ध में; प्रिय = भला, मंगल; चिकीर्षवः = चाहने वाले।
मुझे उन लोगों को देख लेने दीजिए जो धृतराष्ट्र के दुर्बुद्धि-पुत्र दुर्योधन को प्रसन्न करने हेतु इस रणभूमि में एकत्रित हुए हैं।।१।२३।।
देख लूं मैं उन्हें पलक भर ,रण को उत्सुक हैं यहां।
दुर्बुद्धे दुर्योधन के हित, मरने को हैं खड़े जहां।।१।२३।‌।
हरि ॐ तत्सत्।
श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'




श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 022-01-022(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)


यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन्रणसमुद्यमे।।१।२२।।
( यावदेतान्निरीक्षेऽहं = यावत् + एतान् + निरीक्षे + अहम् ) ; यावत् = जब तक ; एतान् =इन्हें ; निरीक्षे = देख लूं ; = मैं ; ( योद्धुकामानवस्थितान् = योद्धुकामान् + अवस्थितान् ) ; योद्धुकामान् = युद्ध की इच्छा रखने वाले को : अवस्थितान् = युद्ध भूमि में एकत्रित ; 
( कैर्मया = कै: + मया ) ; कै: = किन-किन लोगों से ; मया = मेरे द्वारा ; सह = साथ 
( योद्धव्यमस्मिन्रणसमुद्यमे = योद्धव्यम् + अस्मिन् + रण + समुद्यमे ) ; योद्धव्यम् = युद्ध किया जाना ; अस्मिन् = इस ; रण = संग्राम, युद्ध ; समुद्यमे = प्रयास में। 
जब तक मैं युद्ध-भूमि में एकत्रित युद्ध की इच्छा रखने वाले इन लोगों को देख लूं कि मेरे द्वारा किन-किन लोगों के साथ संग्राम में युद्ध किया जाना है।।१।२२।।
देख लूं मैं युद्धकामी, जिससे लड़ना है मुझे। 
समर-भूमि में सामना, किससे करना है मुझे ।।१।२२।।
 हरि ॐ तत्सत्।



- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'

रविवार, 18 फ़रवरी 2024

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 020/021-01-020/021(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

अथव्यवस्थितान्दृष्ट्वा
धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः।
प्रवृत्ते शस्त्रसंपाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः।।
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते।।१।२०।।
अर्जुन उवाच-
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत।।१।२१।।
अथ = तत्पश्चात् ; व्यवस्थितान् = स्थित ; दृष्ट्वा = देखकर ; धार्तराष्ट्रान् = धृतराष्ट्र के पुत्रों को ; कपिध्वजः = जिसकी ध्वजा पर हनुमान सुशोभित हैं ; प्रवृत्ते = उद्धत, कटिबद्ध ; शस्त्रसंपाते = शस्त्र चलाने को ; (धनुरुद्यम्य = धनु: + उद्यम्य) ; धनु: = धनुष ; उद्यम्य = लेकर ; पाण्डव: = पाण्डु-पुत्र(अर्जुन) ; हृषीकेशं = अन्तर्यामी भगवान श्रीकृष्ण को ; तदा = उस समय ; ( वाक्यमिदमाह = वाक्यम् + इदम् + आह ) ; वाक्यम् = वचन ; इदम् = यह ; आह = कहा ; महीपते = हे राजन्! ; अर्जुन उवाच = अर्जुन ने कहा ; ( सेनयोरुभयोर्मध्ये = सेनयो: + उभयो: +मध्ये ) ; सेनयो: = सेनाओं के ; उभयो: = दोनों पक्षों के ; मध्ये = बीच में ; रथं = रथ को ; स्थापय = स्थित करें ; मे = मेरे; अच्युत = हे अच्युत!
तत्पश्चात् हनुमान चिह्न से सुसज्जित ध्वजा वाले रथ पर आरूढ़ होकर पाण्डु-पुत्र अर्जुन हाथों में धनुष लेकर वाण चलाने को उद्धत हुए। व्युह में धृतराष्ट्र के पुत्रों को युद्ध के लिए खड़े देखकर, हे राजन् !उन्होंने हृषीकेश भगवान श्रीकृष्ण से ये वचन कहे ।
अर्जुन ने कहा-
हे अच्युत! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के मध्य स्थित करें।।१।२०-२१।।
कपिध्वज सुशोभित दिव्य रथ से,धार्तराष्ट्र को देख लिया।
वाण निकाले पार्थ हाथ में ,प्रत्यंचा कसकर खींच लिया।।
हे राजन् ! पार्थ अचंभित होकर,कौरव को देख हरि से बोले।
स्वजनों को उन्मत्त देख समर में, विस्मित होकर मुंह खोले।।१।२०।।
अर्जुन ने कहा-
हे अच्युत! हे हरिनाथ! सखा ! मेरे हृदय के हे स्वामी!
सैन्य-दलों के मध्य में रख लें, रथ को मेरे अन्तर्यामी ।।१।२१।‌।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'