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रविवार, 25 फ़रवरी 2024

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 045-01-045(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यता: ।।१।४५।।
अहो = ओह; बत = कितना आश्चर्य है; महत्पापम् = महान् पाप; कर्तुम् = करने को; व्यवसिता: = तैयार हुए हैं;वयम् = हम लोग; (यद्राज्यसुखलोभेन = यत्+राज्यसुखलोभेन); यत् = जो कि; राज्यसुखलोभेन =राज्य और सुख के लोभ से; हन्तुम् = मारने के लिये; स्वजनम् = अपने कुल को; उद्यता: = उद्यत हुए हैं।
ओह ! कितना आश्चर्य है कि हम लोग बुद्धिमान होकर भी महान् पाप करने को तैयार हो गये हैं, जो राज्य तथा सुख के लोभ से स्वजनों को मारने के लिये उद्यत हो गये हैं ।।१।४५।।
ओह!घोर अचरज है कि हम प्रहार को उद्धत खड़ें,
राज्य सुख हित स्वजनों के प्राण लेने को बढ़ें ।
समझ भी है हमें पर कार्य यह अनुचित करें ?
स्वजनों को मारने से लगता हे माधव पाप बड़े ।।१।४५।।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 044-01-044(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।
नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ।।१।४४।।
उत्सन्नकुलधर्माणाम् = नष्ट हुए कुलधर्म वाले; मनुष्याणाम् = मनुष्यों का; जनार्दन =श्री कृष्ण; नरके = नरक में;अनियतम् = अनन्त कालतक; वास: = वास; (भवतीत्यनुशुश्रुम=भवति+इति+अनुशुश्रुम्); भवति = होता है; इति=इस प्रकार; अनुशुश्रुम =सुना है।
हे जनार्दन ! जिनका कुल-धर्म नष्ट हो गया है, ऐसे मनुष्यों का अनिश्चित काल तक नरक में वास होता है, इस प्रकार हम सुनते आये हैं ।।१।४४।।
कुलधर्म नष्ट हुआ जिनका,कृष्ण!नरक वे पाते हैं।
सुना है नर नरकवास में अनंत काल रह जाते हैं।।१।४४।।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 043-01-043(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

दोषैरेतै: कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकै:। 
उत्साद्यन्ते जातिधर्मा: कुलधर्माश्च शाश्वता: ।।१।४३।।
(दोषैरेतै: =दोषै:+ एतै); दोषै: =दोषों से; एतै: = इन; कुलघ्नानाम् = कुल घातियों के; वर्णसंकरकारकै: = वर्णसंकरकारक; उत्साद्यन्ते = नष्ट हो जातेहैं;जातिधर्मा: = जातिधर्म; (कुलधर्माश्च =कुलधर्म:+च); कुलधर्म: =कुलधर्म; च = और; शाश्वता: = सनातन।
इन वर्णसंकरकारक दोषों के कारण कुलघातियों के सनातन कुल-धर्म और जाति-धर्म नष्ट हो जाते हैं ।।१।४३।।कुलधर्म सनातन मिट जाता है इन वर्णसंकर कारक दोष से। 
जाति-धर्म कहाँ टिक पाता है इन कुलघातियों के दोष से ।।१।४३।।

हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 042-01-042(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च । 
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रिया: ।।१।४२।।
संकर: = वर्णसंकर; च =और; कुलस्य = कुल को; (नरकायैव =निकाय+एव); नरकाय = नरक में ले जाने के लिये; एव = ही; कुलघ्रानाम् = कुल घातियों को;कुलस्य = कुल का; च =और;पतन्ति =गिर जाते हैं;पितर: = पितरलोग; (ह्येषां =हि+एषाम् ); हि = भी; एषाम् = इनके; लुप्तपिण्डोदकक्रिया: = लोप हुई पिण्ड और जल की क्रिया वाले।
वर्णसंकर कुलघातियों को तथा कुल को नरक में ले जाने के लिये ही होता है। लुप्त हुई पिण्ड और जल की क्रिया वाले अर्थात् श्राद्ध और तर्पण से वंचित इनके पितर लोग भी अधोगति को प्राप्त होते हैं ।।१।४२।।
कुल और कुलघातियों को नरक देने को प्रभो!
वर्णसंकर जन्म लेते इसी कारण हे अखिल विभो!
वर्णसंकर से पितृगण श्राद्ध नहीं पा सकते हैं।
तर्पणहीन हो ये पितृगण नरकवास पा जाते हैं।।१।४२।।
हरि ॐ तत्सत्।
श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 041-01-041(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रिय:।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकर: ।।१।४१।।(अधर्माभिभवात्कृष्ण=अधर्म+अभिभवात्+कृष्ण); अधर्म =पाप;अभिभवात् = अधिक बढ़ जाने से; प्रदुष्यन्ति = दूषित हो जाती हैं; कुलस्त्रिय: = कुल की स्त्रियां; स्त्रीषु = स्त्रियों के; दुष्टासु = दूषित होने पर; वार्ष्णेय =हे वृष्णिवंशी (श्री कृष्ण); जायते = उत्पन्न होता है; वर्णसंकर: = वर्णसंकर ।
हे श्रीकृष्ण! पाप के अधिक बढ जाने से कुल की स्त्रियाँ अत्यन्त दूषित हो जाती हैं और हे वार्ष्णेय! स्त्रियों के दूषित हो जाने पर वर्णसंकर उत्पन्न होते हैं।।१।४१।।
कुल नारी दुषित हो जाती हैं जब पाप बहुत बढ़ जाता है।
वर्णसंकर उत्पन्न होते हैं ज्यों कृष्ण! पाप अति छाता है।।१।४१।।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 040-01-040(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्मा: सनातना:। 
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ।।१।४०।। 
कुलक्षये =कुल के नाश होने से; प्रणश्यन्ति = नष्ट हो जाते हैं; कुलधर्मा: = कुलधर्म; सनातना: = सनातन; धर्मे नष्टे = धर्म के नाश होने से;कुलं = कुल; (कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत = कृत्स्नम्+अधर्म:+अभिभवति+उत) कृत्स्नम् = संपूर्ण; अधर्म: = पाप; अभिभवति = बहुत बढ़ जाता है;उत = भी । 
कुल के नाश हो जाने से सनातन कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं, धर्म के नाश हो जाने पर सम्पूर्ण कुल में पाप भी बहुत बढ़ जाता है ।।१।४०।
कुल नष्ट होने पर कुलधर्म सनातन मिट जाता है। 
धर्म विनष्ट हुआ ज्यों ही तो पाप बहुत बढ़ जाता है।‌।१।४०।।

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 038/039-01-038/039(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतस: ।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ।।१।३८।।
कथं न ज्ञेयमस्माभि: पापादस्मान्निवर्तितुम् ।कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ।।१।३९।।
(यद्यप्येते = यदि+अपि+ते); यदि = यदि; अपि = भी; एते = ये; न = नहीं; पश्यन्ती = देखते हैं; (लोभोपहतचेतस: = लोभ+उपहत+चेतस: ); लोभ =लोभ; उपहत= अभिभूत; चेतस: = चित्त वाले; (कुलक्षयकृतम् = कुल +क्षय +कृतम्); कुल = कुल; क्षय = नाश; कृतम् = किया हुआ;
दोषम् = दोष को; मित्रद्रोहे = मित्रों के साथ विरोध करने में; पातकम् = पापको;कथम् = क्यों; न =नहीं; ( ज्ञेयमस्माभि: = ज्ञेयम्+अस्माभि: ); ज्ञेयम् = विचार करना चाहिए; अस्माभि: = हम लोगों को;( पापादस्मान्निवर्तितुम् =पापात् +अस्मान्+निवर्तितुम् ); पापात् =पाप से; अस्मान् = हमलोगों को; निवर्तितुम् = बचने के लिये; कुलक्षयकृतम् = कुल के नाश करने से किए गए; दोषम् = दोष ( प्रपश्यद्भिर्जनार्दन = प्रपश्यद्भि:+ जनार्दन); प्रपश्यभ्दि: = जानने वालों के द्वारा; जनार्दन = हे जनार्दन (श्री कृष्ण)!
यद्यपि लोभ से अभिभूत होकर ये लोग कुल के नाश से उत्पन्न दोष को और मित्रों के साथ विरोध करने में किए गए पाप को नहीं देखते, तो भी हे जनार्दन ! कुल के नाश से उत्पन्न दोष को जानने वाले हम लोगों को इस पाप से बचने के लिए क्यों नहीं विचार करना चाहिए ।।१।३८-३९।।
ये मित्र द्रोही लोभ के वश, कुल नाश करने को खड़े।
मित्र द्रोह परम दोष है, कुलक्षयी को लगेंगे पाप बड़े।।
हम जानते कुल नाश से , क्या दोष लगता है प्रभु!
हमें ज्ञात है यह पाप है, बचें न क्यों हे अखिल विभू।।१।३८-३९।।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'