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सोमवार, 19 फ़रवरी 2024

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 023-01-023(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः।।१।२३।‌।
( योत्स्यमानानवेक्षेऽहं = योत्स्यमानान् + अवेक्षे + अहम् )
योत्स्यमानान् = युद्ध करने वाले को; = देख लूं ; अहम् = मैं; य: = जो; (एतेऽत्र = एते+अत्र); एते=वे; अत्र=यहां; समागता:=एकत्रित; धार्तराष्ट्रस्य=धृतराष्ट्र के पुत्रों के; (दुर्बुद्धेर्युद्धे = दुर्बुद्धे:+युद्धे); दुर्बुद्धे: = दुर्बुद्धि; युद्धे = युद्ध में; प्रिय = भला, मंगल; चिकीर्षवः = चाहने वाले।
मुझे उन लोगों को देख लेने दीजिए जो धृतराष्ट्र के दुर्बुद्धि-पुत्र दुर्योधन को प्रसन्न करने हेतु इस रणभूमि में एकत्रित हुए हैं।।१।२३।।
देख लूं मैं उन्हें पलक भर ,रण को उत्सुक हैं यहां।
दुर्बुद्धे दुर्योधन के हित, मरने को हैं खड़े जहां।।१।२३।‌।
हरि ॐ तत्सत्।
श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'




श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 022-01-022(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)


यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन्रणसमुद्यमे।।१।२२।।
( यावदेतान्निरीक्षेऽहं = यावत् + एतान् + निरीक्षे + अहम् ) ; यावत् = जब तक ; एतान् =इन्हें ; निरीक्षे = देख लूं ; = मैं ; ( योद्धुकामानवस्थितान् = योद्धुकामान् + अवस्थितान् ) ; योद्धुकामान् = युद्ध की इच्छा रखने वाले को : अवस्थितान् = युद्ध भूमि में एकत्रित ; 
( कैर्मया = कै: + मया ) ; कै: = किन-किन लोगों से ; मया = मेरे द्वारा ; सह = साथ 
( योद्धव्यमस्मिन्रणसमुद्यमे = योद्धव्यम् + अस्मिन् + रण + समुद्यमे ) ; योद्धव्यम् = युद्ध किया जाना ; अस्मिन् = इस ; रण = संग्राम, युद्ध ; समुद्यमे = प्रयास में। 
जब तक मैं युद्ध-भूमि में एकत्रित युद्ध की इच्छा रखने वाले इन लोगों को देख लूं कि मेरे द्वारा किन-किन लोगों के साथ संग्राम में युद्ध किया जाना है।।१।२२।।
देख लूं मैं युद्धकामी, जिससे लड़ना है मुझे। 
समर-भूमि में सामना, किससे करना है मुझे ।।१।२२।।
 हरि ॐ तत्सत्।



- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'

रविवार, 18 फ़रवरी 2024

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 020/021-01-020/021(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

अथव्यवस्थितान्दृष्ट्वा
धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः।
प्रवृत्ते शस्त्रसंपाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः।।
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते।।१।२०।।
अर्जुन उवाच-
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत।।१।२१।।
अथ = तत्पश्चात् ; व्यवस्थितान् = स्थित ; दृष्ट्वा = देखकर ; धार्तराष्ट्रान् = धृतराष्ट्र के पुत्रों को ; कपिध्वजः = जिसकी ध्वजा पर हनुमान सुशोभित हैं ; प्रवृत्ते = उद्धत, कटिबद्ध ; शस्त्रसंपाते = शस्त्र चलाने को ; (धनुरुद्यम्य = धनु: + उद्यम्य) ; धनु: = धनुष ; उद्यम्य = लेकर ; पाण्डव: = पाण्डु-पुत्र(अर्जुन) ; हृषीकेशं = अन्तर्यामी भगवान श्रीकृष्ण को ; तदा = उस समय ; ( वाक्यमिदमाह = वाक्यम् + इदम् + आह ) ; वाक्यम् = वचन ; इदम् = यह ; आह = कहा ; महीपते = हे राजन्! ; अर्जुन उवाच = अर्जुन ने कहा ; ( सेनयोरुभयोर्मध्ये = सेनयो: + उभयो: +मध्ये ) ; सेनयो: = सेनाओं के ; उभयो: = दोनों पक्षों के ; मध्ये = बीच में ; रथं = रथ को ; स्थापय = स्थित करें ; मे = मेरे; अच्युत = हे अच्युत!
तत्पश्चात् हनुमान चिह्न से सुसज्जित ध्वजा वाले रथ पर आरूढ़ होकर पाण्डु-पुत्र अर्जुन हाथों में धनुष लेकर वाण चलाने को उद्धत हुए। व्युह में धृतराष्ट्र के पुत्रों को युद्ध के लिए खड़े देखकर, हे राजन् !उन्होंने हृषीकेश भगवान श्रीकृष्ण से ये वचन कहे ।
अर्जुन ने कहा-
हे अच्युत! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के मध्य स्थित करें।।१।२०-२१।।
कपिध्वज सुशोभित दिव्य रथ से,धार्तराष्ट्र को देख लिया।
वाण निकाले पार्थ हाथ में ,प्रत्यंचा कसकर खींच लिया।।
हे राजन् ! पार्थ अचंभित होकर,कौरव को देख हरि से बोले।
स्वजनों को उन्मत्त देख समर में, विस्मित होकर मुंह खोले।।१।२०।।
अर्जुन ने कहा-
हे अच्युत! हे हरिनाथ! सखा ! मेरे हृदय के हे स्वामी!
सैन्य-दलों के मध्य में रख लें, रथ को मेरे अन्तर्यामी ।।१।२१।‌।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'




शनिवार, 17 फ़रवरी 2024

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 019-01-019(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)


स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलोऽभ्यनुनादयन्।।१।१९।।
स: = वह(उस) ; घोष: = शब्द ; धार्तराष्ट्राणां = धृतराष्ट्र के पुत्रों के ; हृदयानि = हृदय को ; व्यदारयत् = विदीर्ण कर दिया ; ( नभश्च = नमः + च ) ; नभ: = आकाश ; पृथिवीं = धरती ; (चैव = च + एव ) ; च = और ; एव = निश्चय ही ; तुमुल: = कोलाहलपूर्ण ; अभ्यनुनादयन् = प्रति ध्वनित करता हुआ।
उन सभी की ध्वनि मिलकर कोलाहलपूर्ण बन गई जो आकाश और धरती को प्रतिध्वनित करते हुए धृतराष्ट्र के पुत्रों के हृदय को विदीर्ण कर दिया, अर्थात् उनमें भय उत्पन्न कर दिया।।१।१९।।
तुमुल वाद्य वो शंखध्वनि से, धरा गगन बीच शोर हुआ।
फट गई छाती धार्तराष्ट्र के, भय अमिट कमजोर हुआ।।१।१९।।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'





श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 016/017/018-01-016/017/018(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

 
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ।।१।१६।।
काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः।।१।१७।।
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते।
सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक्पृथक्।।१।१८।।
अनंतविजयं = अनंतविजय नामक शंख को ( युधिष्ठिर के शंख का नाम ) ; कुन्तीपुत्र: = कुन्तीपुत्र ; युधिष्ठिर : = युधिष्ठिर ; नकुल: = नकुल ; ( सहदेवश्च = सहदेव: + च ) ; सहदेव: = सहदेव ; च = और ; सुघोष: = सुघोष नामक शंख ( नकुल के शंख का नाम ) ; मणिपुष्पक: = मणिपुष्पक नामक शंख ( सहदेव के शंख का नाम ) ;( काश्यश्च = काश्य: + च ) ; काश्य: = काशी के राजा ; च = और ; ( परमेष्वास: = परम + इषु + आस: ) ; परमेष्वास: = महान् धनुर्धर ; शिखण्डी = शिखण्डी ; महारथ: = महान् योद्धा ; धृष्टद्युम्न: = धृष्टद्युम्न ( राजा द्रुपद का पुत्र ) ; ( विराटश्च = विराट: + च ) ; विराट = राजा विराट ;
( सात्यकिश्चापराजितः = सात्यकि: + च + अपराजित: )सात्यकि: = सात्यकि ( भगवान श्रीकृष्ण के साथी ) ; अपराजित: = सदा विजयी , न हारने वाले ;
द्रुपद: = राजा द्रुपद ; ( द्रौपदेयाश्च = द्रौपदेया: + च ) ; द्रौपदेया: = द्रौपदी के पुत्र ; सर्वश: = सभी ; पृथ्वीपते = हे राजन् !;( सौभद्रश्च = सौभद्र: + च ) ; सौभद्र: = सुभद्रा के पुत्र अभिमन्यु ; महाबाहुः = महाबाहु, विशाल भुजाओं वाले ; ( शङ्खान्दध्मुः = शङ्खान् + दध्मु: ) ; शञ्खान् = शंखों ; दध्मु: = बजाया ;पृथक्पृथक् = अलग-अलग।
कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनंतविजय नामक अपने शंख को बजाया। नकुल और सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक नामक अपने-अपने शंख को बजाया।।१।१६।।
महान् धनुर्धर काशिराज तथा महान् योद्धा शिखण्डी, धृष्टद्युम्न, राजा विराट और अजेय सात्यकि ने भी अपने-अपने शंख को बजाया।।११७।।
हे राजन्! राजा द्रुपद और द्रौपदी के सभी पुत्र तथा सुभद्रापुत्र महाबाहु अभिमन्यु ने अलग-अलग अपने-अपने शंख को जोर से बजाया।।१।१८।।
अनंतविजय की ध्वनि सुनाकर, युधिष्ठिर वर वीर उद्घोष किया।
सुघोष-वो-मणिपुष्पक के संग, नकुल सहदेव जयघोष किया।।१।१६।।
काशिराज पधारे परम धनुर्धर , शिखण्डी महारथी बलशाली।
सात्यकि अजेय धृष्टद्युम्न विराट ने, किए शंखध्वनि नादोंवाली।।१।१७।‌।
हे राजन्। राजा द्रुपद और द्रौपदी के पुत्र ने , अपने शंख बजाये हैं।
इस रणभूमि में महाबाहु सुभद्रा पुत्र ने, पृथक् ही शंख बजाये हैं।।१‌।१८।।

शुक्रवार, 16 फ़रवरी 2024

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 015-01-015(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनंजयः।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः।।१।१५।।
पाञ्चजन्यं = पाञ्चजन्य नामक शंख को( भगवान श्रीकृष्ण के शंख का नाम ) ; हृषीकेश: = अन्तर्यामी भगवान श्रीकृष्ण ; देवदत्तं = देवदत्त नामक शंख को (अर्जुन के शंख का नाम ) ; धनंजय: = अर्जुन ( धन को जीतने वाले ) ; पौण्ड्रं = पौण्ड्र नामक शंख को ( भीम के शंख का नाम ) ; दध्मौ = बजाया ; महाशङ्खं = विशाल शंख को ; भीमकर्मा = भयानक ( भीषण ) कर्म करने वाले ; वृकोदर: = वृकोदर, भीम ( भीम के पेट में वृक नामक अग्नि था जिसके कारण उसका भोजन शीघ्र ही पच जाता था और भूख लग जाती थी। )
हृषीकेश भगवान श्रीकृष्ण ने पाञ्चजन्य नामक शंख को बजाया और धनञ्जय अर्जुन ने देवदत्त नामक शंख को जोर से बजाया। तभी भीमकर्मा वृकोदर भीम ने अपने विशाल पौण्ड्र नामक शंख को बहुत जोर से बजाया।।१।१५।।
माधव ने अब पाञ्चजन्य को, देवदत्त को पार्थ बजा डाला।
भीमकर्मा वृकोदर भीम ने, शंख पौण्ड्र बजाया मतवाला।।१।१५।‌।

श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 014-01-014(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)

ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः।।१।१४।।
तत: = तत्पश्चात, उसके बाद ; ( श्वेतैर्हयैर्युक्ते = श्वेतै: + हयै: + युक्ते ) ; श्वेतै: = श्वेत, सफेद ; हयै: = घोड़ें ; युक्ते = युक्त ; महति = विशाल ; स्यन्दने = रथ पर ; स्थितौ = स्थित होकर, सवार होकर ; माधव: = श्री कृष्ण ; ( पाण्डवश्चैव = पाण्डव: + च + एव ) ; पाण्डव: = पाण्डु के पुत्र ; च = और ; एव = निश्चय ही ; दिव्यौ = दिव्य ( द्विवचन )शङ्खौ = दोनों शंख ; प्रदध्मतु: = बजाये।
तत्पश्चात दूसरी ओर श्वेत घोड़ों से सुसज्जित विशाल रथ पर सवार होकर भगवान श्रीकृष्ण और पाण्डु-पुत्र अर्जुन ने अपने-अपने दिव्य शंख बजाये।
श्वेत तुरंग से युक्त रथ पर,श्रीकृष्ण-अर्जुन प्रकट हुए।
दोनों ने दिव्य शंख बजाये,तुमुल शब्द तब विकट हुए।।१।१४।।