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शुक्रवार, 4 अप्रैल 2025
गुरुवार, 3 अप्रैल 2025
मंगलवार, 1 अप्रैल 2025
सोमवार, 26 फ़रवरी 2024
श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 048-02-001(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)
संजय उवाच-
तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदन: ।।२।१।।
संजय बोले-
इस प्रकार करुणा से व्याप्त और आँसुओं से पूर्ण तथा व्याकुल नेत्रों वाले शोकयुक्त उस अर्जुन से भगवान् मधुसूदन श्री कृष्ण ने यह वचन कहा ।।२।१।।
तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदन: ।।२।१।।
संजय बोले-
इस प्रकार करुणा से व्याप्त और आँसुओं से पूर्ण तथा व्याकुल नेत्रों वाले शोकयुक्त उस अर्जुन से भगवान् मधुसूदन श्री कृष्ण ने यह वचन कहा ।।२।१।।
संजय = संजय; उवाच = बोले; तम् = उस(अर्जुन को;(कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् =कृपया+आविष्टम्+अश्रुपूर्णा+कुलेक्षणम्); कृपया = करुणा से ; आविष्टम् = व्याप्त; अश्रुपूर्णा कुलेक्षणम् = आंसुओंसे पूर्ण; ( विषीदन्तमिदं = विषदन्तम् +इदं ); विषीदन्तम् = शोकयुक्त; इदम् = यह; वाक्यम् = वचन; उवाच = कहा; मधुसूदन: = भगवान् मधुसूदन (श्री कृष्ण ने )।
अश्रु नयन करुणा भरे, शोकाकुल अर्जुन बेचैन रहे।
मधुसूदन ने उन्हें देखकर , इस प्रकार के वचन कहे।।२।१।।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'
हिन्दी पद्यात्मक श्रीमद्भगवद्गीता
हिन्दी पद्यात्मक श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय 1
धृतराष्ट्र बोले-
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में, जुटे सब लड़ने को अहो।
मेरे और पाण्डु सुतों ने, क्या किया संजय कहो।।१-१।।
संजय ने कहा-
व्यूह रचना जब सैनिकों की, पाण्डवों ने कर लिया।
देखकर राजा दुर्योधन, गुरु निकट जा विनती किया।।१।२।।
विशाल सेना पाण्डवों की, व्यूह-रचना हे गुरुवर देखिए ।
सजा है बुद्धि कला से , तव शिष्य द्रुपद-पुत ने है किए।।१।३।।
पाण्डु-दल में अनेक, अर्जुन भीम जैसे वीर हैं।
महारथी युयुधान राजा, द्रुपद विराट रणवीर हैं।।१।४।।
धृष्टकेतु चेकितान भी हैं, काशिराज जैसे वीर हैं।
पुरुजित् कुन्तिभोज भी हैं, शैव्य तुल्य नरवीर हैं।।१।५।।
युधामन्यु पराक्रमी हैं, उत्तमौजा बलवीर हैं।
सुभद्रा और द्रौपदी के, सभी सुत रणवीर हैं।।१।६।।
हे द्विजश्रेष्ठ ! अपने समर के विशिष्ट योद्धा जान लें।
सैन्य-संचालन निपुण हैं, कह रहा आप संज्ञान लें।।१।७।।
मेरे दल में आप भी हैं,भीष्म कृपा और कर्ण हैं।
संग्राम भूमि में सदा विजयी, अश्वत्थ भूरि विकर्ण हैं।।१।८।।
मरने को तैयार रण में, मेरे हित सब वीर हैं।
आयुधों से युक्त भी हैं, समर चतुर रणधीर हैं।।।।१।९।।
पितामहरक्षित कौरव बल है, अपनी सेना अजेय है।
भीमरक्षित पाण्डु -दल हैं, सीमित सुगम वो जेय है।।१।१०।।
सभी अयनों पर अडिग होकर, आप सभी संग्राम करें।
पितामह को सहयोग करें, निश्चय ही अविराम करें ।।१।११।।
प्रतापी पितामह भीष्मवर ने, शंख बजाया अति जोर से।
शंख-ध्वनि सिंहनाद सुनकर, दुर्योधन खुश हैं शोर से ।।१।१२।।
तभी शंख बिगुल मृदंग तुरही, नगाड़े श्रृंगी बज उठे।
समवेत स्वर से गुंजी धरती, अतीव कोलाहल हुए।।१।१३।।
श्वेत तुरंग से युक्त रथ पर,श्रीकृष्ण-अर्जुन प्रकट हुए।
दोनों ने दिव्य शंख बजाये,तुमुल शब्द तब विकट हुए।।१।१४।।
माधव ने अब पाञ्चजन्य को, देवदत्त को पार्थ बजा डाला।
भीमकर्मा वृकोदर भीम ने, शंख पौण्ड्र बजाया मतवाला।।१।१५।।
अनंतविजय की ध्वनि सुनाकर, युधिष्ठिर वर वीर उद्घोष किया।
सुघोष-वो-मणिपुष्पक के संग, नकुल सहदेव जयघोष किया।।१।१६।।
काशिराज पधारे परम धनुर्धर , शिखण्डी महारथी बलशाली।
सात्यकि अजेय धृष्टद्युम्न विराट ने, किए शंखध्वनि नादोंवाली।।१।१७।।
हे राजन्। राजा द्रुपद और द्रौपदी के पुत्र ने , अपने शंख बजाये हैं।
इस रणभूमि में महाबाहु सुभद्रा पुत्र ने, पृथक् ही शंख बजाये हैं।।१।१८।।
तुमुल वाद्य वो शंखध्वनि से, धरा गगन बीच शोर हुआ।
फट गई छाती धार्तराष्ट्र के, भय अमिट कमजोर हुआ।।१।१९।।
कपिध्वज सुशोभित दिव्य रथ से,धार्तराष्ट्र को देख लिया।
वाण निकाले पार्थ हाथ में ,प्रत्यंचा कसकर खींच लिया।।
हे राजन् ! पार्थ अचंभित होकर,कौरव को देख हरि से बोले।
स्वजनों को उन्मत्त देख समर में, विस्मित होकर मुंह खोले।।१।२०।।
अर्जुन ने कहा- हे अच्युत! हे हरिनाथ! सखा ! मेरे हृदय के हे स्वामी!
सैन्य-दलों के मध्य में रख लें, रथ को मेरे अन्तर्यामी ।।१।२१।।
देख लूं मैं युद्धकामी, जिससे लड़ना है मुझे।
समर-भूमि में सामना, किससे करना है मुझे ।।१।२२।।
देख लूं मैं उन्हें पलक भर ,रण को उत्सुक हैं यहां।
दुर्बुद्धे दुर्योधन के हित, मरने को हैं खड़े जहां।।१।२३।।
भारत!गुडाकेश अर्जुन ने, जब हरि से ऐसे वचन कहे।
सुनकर प्रभु उत्तम रथ लेकर, सैन्य-मध्य वे खड़े रहे।।१।२४।।
भीष्म महीप द्रोण समक्ष, प्रभु ने ऐसे वचन कहे।
देखो पार्थ इन वीरों को, कुरु-कुल के हैं नाम बड़े ।।१।२५।।
वहां पार्थ ने रण में देखा, पितर पितामह खड़े हुए।
गुरु मामा भाई पुत्र सब, पौत्र मित्र भी भरे हुए।।
अनेक श्वसुर भी लड़ने आए, मरने को तैयार खड़े।
हितचिंतक नहीं हटने वाले,यम से भी जो नहीं डरे।।१।।२६।।
अर्जुन ने जब देखा बांधव, सगे- सम्बन्धी खड़े रण में।
बोला करुणा दया से घिर कर, शोक विकल बड़े मन में।।१।२७।।
रणोत्सुक देख इन बांधवों को, अंग शिथिल से, कृष्ण मेरे हो रहे हैं।
मुख सूख रहे हैं, तन में मेरे रोमांच कंपन, अजब कैसे हो रहे हैं।।१।।२८-२९।।
गाण्डीव जैसे धनुष मेरे, हस्त गिरते, त्वचा मेरी जल रही है।
मन भ्रमित-सा , असमर्थ स्थित, दशा अजब -सी हो रही है।।१।३०।।
लक्षण विपरीत हैं दिखते, हे केशव! इसे पहचानता ।
स्वजनों को मारकर, नहीं कल्याण पूर्व ही जानता।।१।३१।।
हे कृष्ण! विजय नहीं चाहता, न राज्य सुख की चाह है।
जीवन राज्य भोग व्यर्थ हैं, ज्यों स्वजनों की आह है।।१।३२।।
जिनके लिए मैं चाहता राज्य सुख और भोग को।
प्राण धन की आस छोड़ें, रण में खड़े वे योग को।।१।३३।।
पिता पुत्र और गुरु पितामह रणआंगन में खड़े।
मामा ससुर और पौत्र सालें अन्य सम्बन्धी बड़े।।१।३४।।
हे नाथ! त्रिलोक के राज्य हित न मारता, मारें मुझे।
मही सुख अति तुच्छ है, संघारना क्यों बिन बुझे।।१।३५।।
हे जनार्दन! होगी खुशी क्या हमें धृतराष्ट्र सुतों को मारकर।
क्या न होगा पाप अवश्य ही इन आततायियों को संहार कर ।।१।३६।।
हे माधव!नहीं हम योग्य हैं, मारूं धार्तराष्ट्रों को यहाँ ।
स्वजनों को ही मारकर,हम होंगे सुखी माधव! कहाँ।।१।३७।।
ये मित्र द्रोही लोभ के वश, कुल नाश करने को खड़े।
मित्र द्रोह परम दोष है, कुलक्षयी को लगेंगे पाप बड़े।।
हम जानते कुल नाश से , क्या दोष लगता है प्रभु!
हमें ज्ञात है यह पाप है, बचें न क्यों हे अखिल विभू।।१।३८-३९।।
कुल नष्ट होने पर कुलधर्म सनातन मिट जाता है।
धर्म विनष्ट हुआ ज्यों ही तो पाप बहुत बढ़ जाता है।।१।४०।।
कुल नारी दुषित हो जाती हैं जब पाप बहुत बढ़ जाता है।
वर्णसंकर उत्पन्न होते हैं ज्यों कृष्ण! पाप अति छाता है।।१।४१।।।।
कुल और कुलघातियों को नरक देने को प्रभो!
वर्णसंकर जन्म लेते इसी कारण हे अखिल विभो!
वर्णसंकर से पितृगण श्राद्ध नहीं पा सकते हैं।
तर्पणहीन हो ये पितृगण नरकवास पा जाते हैं।।१।४२।।
कुलधर्म सनातन मिट जाता है इन वर्णसंकर कारक दोष से।
जाति-धर्म कहाँ टिक पाता है इन कुलघातियों के दोष से ।।१।४३।।
कुलधर्म नष्ट हुआ जिनका,कृष्ण!नरक वे पाते हैं।
सुना है नर नरकवास में अनंत काल रह जाते हैं।।१।४४।।
ओह!घोर अचरज है कि हम प्रहार को उद्धत खड़े,
राज्य सुख हित स्वजनों के प्राण लेने को बढ़े ।
समझ भी है हमें पर कार्य यह अनुचित करें,
स्वजनों को मारने से लगते हैं माधव! पाप बड़े ।।१।४५।।
शस्त्रविहीन अप्रतीकारी भी हूँ, कौरव सशस्त्र भरे सारे।
मरना भी श्रेयस्कर होगा, धार्तराष्ट्र यदि मुझे मारे।।१।४६।।
संजय बोले –
रणभूमि में उद्विग्न मन से अर्जुन ने धनु शर त्याग दिए।
रथ आसन पर पीछे जा बैठे, रण लड़ने से वितराग किए।।१।४७।।
कृष्ण -अर्जुन संवाद रूप का प्रथम अध्याय यह पूर्ण हुआ।
योगशास्त्र में विषादयोग का यह सोपान परिपूर्ण हुआ।।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'
हिन्दी पद्यात्मक श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय 2
रविवार, 25 फ़रवरी 2024
हिन्दी पद्यात्मक श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 1 संपूर्ण
हिन्दी पद्यात्मक श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय 1
धृतराष्ट्र बोले-
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में, जुटे सब लड़ने को अहो।
मेरे और पाण्डु सुतों ने, क्या किया संजय कहो।।१-१।।
संजय ने कहा-
व्यूह रचना जब सैनिकों की, पाण्डवों ने कर लिया।
देखकर राजा दुर्योधन, गुरु निकट जा विनती किया।।१।२।।
विशाल सेना पाण्डवों की, व्यूह-रचना हे गुरुवर देखिए ।
सजा है बुद्धि कला से , तव शिष्य द्रुपद-पुत ने है किए।।१।३।।
पाण्डु-दल में अनेक, अर्जुन भीम जैसे वीर हैं।
महारथी युयुधान राजा, द्रुपद विराट रणवीर हैं।।१।४।।
धृष्टकेतु चेकितान भी हैं, काशिराज जैसे वीर हैं।
पुरुजित् कुन्तिभोज भी हैं, शैव्य तुल्य नरवीर हैं।।१।५।।
युधामन्यु पराक्रमी हैं, उत्तमौजा बलवीर हैं।
सुभद्रा और द्रौपदी के, सभी सुत रणवीर हैं।।१।६।।
हे द्विजश्रेष्ठ ! अपने समर के विशिष्ट योद्धा जान लें।
सैन्य-संचालन निपुण हैं, कह रहा आप संज्ञान लें।।१।७।।
मेरे दल में आप भी हैं,भीष्म कृपा और कर्ण हैं।
संग्राम भूमि में सदा विजयी, अश्वत्थ भूरि विकर्ण हैं।।१।८।।
मरने को तैयार रण में, मेरे हित सब वीर हैं।
आयुधों से युक्त भी हैं, समर चतुर रणधीर हैं।।।।१।९।।
पितामहरक्षित कौरव बल है, अपनी सेना अजेय है।
भीमरक्षित पाण्डु -दल हैं, सीमित सुगम वो जेय है।।१।१०।।
सभी अयनों पर अडिग होकर, आप सभी संग्राम करें।
पितामह को सहयोग करें, निश्चय ही अविराम करें ।।१।११।।
प्रतापी पितामह भीष्मवर ने, शंख बजाया अति जोर से।
शंख-ध्वनि सिंहनाद सुनकर, दुर्योधन खुश हैं शोर से ।।१।१२।।
तभी शंख बिगुल मृदंग तुरही, नगाड़े श्रृंगी बज उठे।
समवेत स्वर से गुंजी धरती, अतीव कोलाहल हुए।।१।१३।।
श्वेत तुरंग से युक्त रथ पर,श्रीकृष्ण-अर्जुन प्रकट हुए।
दोनों ने दिव्य शंख बजाये,तुमुल शब्द तब विकट हुए।।१।१४।।
माधव ने अब पाञ्चजन्य को, देवदत्त को पार्थ बजा डाला।
भीमकर्मा वृकोदर भीम ने, शंख पौण्ड्र बजाया मतवाला।।१।१५।।
अनंतविजय की ध्वनि सुनाकर, युधिष्ठिर वर वीर उद्घोष किया।
सुघोष-वो-मणिपुष्पक के संग, नकुल सहदेव जयघोष किया।।१।१६।।
काशिराज पधारे परम धनुर्धर , शिखण्डी महारथी बलशाली।
सात्यकि अजेय धृष्टद्युम्न विराट ने, किए शंखध्वनि नादोंवाली।।१।१७।।
हे राजन्। राजा द्रुपद और द्रौपदी के पुत्र ने , अपने शंख बजाये हैं।
इस रणभूमि में महाबाहु सुभद्रा पुत्र ने, पृथक् ही शंख बजाये हैं।।१।१८।।
तुमुल वाद्य वो शंखध्वनि से, धरा गगन बीच शोर हुआ।
फट गई छाती धार्तराष्ट्र के, भय अमिट कमजोर हुआ।।१।१९।।
कपिध्वज सुशोभित दिव्य रथ से,धार्तराष्ट्र को देख लिया।
वाण निकाले पार्थ हाथ में ,प्रत्यंचा कसकर खींच लिया।।
हे राजन् ! पार्थ अचंभित होकर,कौरव को देख हरि से बोले।
स्वजनों को उन्मत्त देख समर में, विस्मित होकर मुंह खोले।।१।२०।।
अर्जुन ने कहा- हे अच्युत! हे हरिनाथ! सखा ! मेरे हृदय के हे स्वामी!
सैन्य-दलों के मध्य में रख लें, रथ को मेरे अन्तर्यामी ।।१।२१।।
देख लूं मैं युद्धकामी, जिससे लड़ना है मुझे।
समर-भूमि में सामना, किससे करना है मुझे ।।१।२२।।
देख लूं मैं उन्हें पलक भर ,रण को उत्सुक हैं यहां।
दुर्बुद्धे दुर्योधन के हित, मरने को हैं खड़े जहां।।१।२३।।
भारत!गुडाकेश अर्जुन ने, जब हरि से ऐसे वचन कहे।
सुनकर प्रभु उत्तम रथ लेकर, सैन्य-मध्य वे खड़े रहे।।१।२४।।
भीष्म महीप द्रोण समक्ष, प्रभु ने ऐसे वचन कहे।
देखो पार्थ इन वीरों को, कुरु-कुल के हैं नाम बड़े ।।१।२५।।
वहां पार्थ ने रण में देखा, पितर पितामह खड़े हुए।
गुरु मामा भाई पुत्र सब, पौत्र मित्र भी भरे हुए।।
अनेक श्वसुर भी लड़ने आए, मरने को तैयार खड़े।
हितचिंतक नहीं हटने वाले,यम से भी जो नहीं डरे।।१।।२६।।
अर्जुन ने जब देखा बांधव, सगे- सम्बन्धी खड़े रण में।
बोला करुणा दया से घिर कर, शोक विकल बड़े मन में।।१।२७।।
रणोत्सुक देख इन बांधवों को, अंग शिथिल से, कृष्ण मेरे हो रहे हैं।
मुख सूख रहे हैं, तन में मेरे रोमांच कंपन, अजब कैसे हो रहे हैं।।१।।२८-२९।।
गाण्डीव जैसे धनुष मेरे, हस्त गिरते, त्वचा मेरी जल रही है।
मन भ्रमित-सा , असमर्थ स्थित, दशा अजब -सी हो रही है।।१।३०।।
लक्षण विपरीत हैं दिखते, हे केशव! इसे पहचानता ।
स्वजनों को मारकर, नहीं कल्याण पूर्व ही जानता।।१।३१।।
हे कृष्ण! विजय नहीं चाहता, न राज्य सुख की चाह है।
जीवन राज्य भोग व्यर्थ हैं, ज्यों स्वजनों की आह है।।१।३२।।
जिनके लिए मैं चाहता राज्य सुख और भोग को।
प्राण धन की आस छोड़ें, रण में खड़े वे योग को।।१।३३।।
पिता पुत्र और गुरु पितामह रणआंगन में खड़े।
मामा ससुर और पौत्र सालें अन्य सम्बन्धी बड़े।।१।३४।।
हे नाथ! त्रिलोक के राज्य हित न मारता, मारें मुझे।
मही सुख अति तुच्छ है, संघारना क्यों बिन बुझे।।१।३५।।
हे जनार्दन! होगी खुशी क्या हमें धृतराष्ट्र सुतों को मारकर।
क्या न होगा पाप अवश्य ही इन आततायियों को संहार कर ।।१।३६।।
हे माधव!नहीं हम योग्य हैं, मारूं धार्तराष्ट्रों को यहाँ ।
स्वजनों को ही मारकर,हम होंगे सुखी माधव! कहाँ।।१।३७।।
ये मित्र द्रोही लोभ के वश, कुल नाश करने को खड़े।
मित्र द्रोह परम दोष है, कुलक्षयी को लगेंगे पाप बड़े।।
हम जानते कुल नाश से , क्या दोष लगता है प्रभु!
हमें ज्ञात है यह पाप है, बचें न क्यों हे अखिल विभू।।१।३८-३९।।
कुल नष्ट होने पर कुलधर्म सनातन मिट जाता है।
धर्म विनष्ट हुआ ज्यों ही तो पाप बहुत बढ़ जाता है।।१।४०।।
कुल नारी दुषित हो जाती हैं जब पाप बहुत बढ़ जाता है।
वर्णसंकर उत्पन्न होते हैं ज्यों कृष्ण! पाप अति छाता है।।१।४१।।।।
कुल और कुलघातियों को नरक देने को प्रभो!
वर्णसंकर जन्म लेते इसी कारण हे अखिल विभो!
वर्णसंकर से पितृगण श्राद्ध नहीं पा सकते हैं।
तर्पणहीन हो ये पितृगण नरकवास पा जाते हैं।।१।४२।।
कुलधर्म सनातन मिट जाता है इन वर्णसंकर कारक दोष से।
जाति-धर्म कहाँ टिक पाता है इन कुलघातियों के दोष से ।।१।४३।।
कुलधर्म नष्ट हुआ जिनका,कृष्ण!नरक वे पाते हैं।
सुना है नर नरकवास में अनंत काल रह जाते हैं।।१।४४।।
ओह!घोर अचरज है कि हम प्रहार को उद्धत खड़े,
राज्य सुख हित स्वजनों के प्राण लेने को बढ़े ।
समझ भी है हमें पर कार्य यह अनुचित करें,
स्वजनों को मारने से लगते हैं माधव! पाप बड़े ।।१।४५।।
शस्त्रविहीन अप्रतीकारी भी हूँ, कौरव सशस्त्र भरे सारे।
मरना भी श्रेयस्कर होगा, धार्तराष्ट्र यदि मुझे मारे।।१।४६।।
संजय बोले –
रणभूमि में उद्विग्न मन से अर्जुन ने धनु शर त्याग दिए।
रथ आसन पर पीछे जा बैठे, रण लड़ने से वितराग किए।।१।४७।।
कृष्ण -अर्जुन संवाद रूप का प्रथम अध्याय यह पूर्ण हुआ।
योगशास्त्र में विषादयोग का यह सोपान परिपूर्ण हुआ।।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'
श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 047-01-047(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)
संजय उवाच –
एवमुक्त्वार्जुन: संख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानस: ।।१।४७।।
एवम् = इस प्रकार;उक्त्वा =कहकर; अर्जुन: =अर्जुन; (एवमुक्त्वार्जुन: =एवम्+उक्त्वा+अर्जुन;संख्ये= रणभूमि में; (रथोपस्थ=रथ+उपस्थ);रथ = रथ के; उपस्थ=पिछले भाग में (आसन पर);उपाविशत् = बैठ गया;विसृज्य = त्यागकर; सशरम् = बाणसहित; चापम् =धनुष को; शोकसंविग्नमानस: = शोक से उद्विग्न मन वाला।
एवमुक्त्वार्जुन: संख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानस: ।।१।४७।।
एवम् = इस प्रकार;उक्त्वा =कहकर; अर्जुन: =अर्जुन; (एवमुक्त्वार्जुन: =एवम्+उक्त्वा+अर्जुन;संख्ये= रणभूमि में; (रथोपस्थ=रथ+उपस्थ);रथ = रथ के; उपस्थ=पिछले भाग में (आसन पर);उपाविशत् = बैठ गया;विसृज्य = त्यागकर; सशरम् = बाणसहित; चापम् =धनुष को; शोकसंविग्नमानस: = शोक से उद्विग्न मन वाला।
संजय -बोले
रणभूमि में शोक से उद्विग्न मन वाला अर्जुन इस प्रकार कहकर वाण सहित धनुष को त्यागकर रथ के आसन पर बैठ गया ।।१।४७।।
संजय बोले –
रणभूमि में उद्विग्न मन से अर्जुन ने धनु शर त्याग दिए।
रथ आसन पर पीछे जा बैठे, रण लड़ने से वितराग किए।।१।४७।।
रणभूमि में शोक से उद्विग्न मन वाला अर्जुन इस प्रकार कहकर वाण सहित धनुष को त्यागकर रथ के आसन पर बैठ गया ।।१।४७।।
संजय बोले –
रणभूमि में उद्विग्न मन से अर्जुन ने धनु शर त्याग दिए।
रथ आसन पर पीछे जा बैठे, रण लड़ने से वितराग किए।।१।४७।।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'
श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 046-01-046(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)
मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणय: ।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ।।१।४६।।
यदि = यदि; (मामप्रतीकारमशस्त्रं =माम्+अप्रतीकारम् +अशस्त्रम्); माम्=मुझे; अप्रतीकारम् = न सामना करने वाले को;अशस्त्रम् = शस्त्ररहित: शस्त्रपाणय: = शस्त्रधारी; धार्तराष्ट्रा: =धृतराष्ट्र के पुत्र; रणे = रण में;(हन्युस्तन्मे=हन्यु:+तत्+मे); हन्यु: = मारें; तत् =वह; मे = मेरे ; क्षेमतरम् = अतिकल्याण कारक; भवेत् = होगा;
यदि मुझ शस्त्ररहित एवं सामना न करने वाले को शस्त्रधारी धृतराष्ट्र के पुत्र रण में मार डालें तो वह मारना भी मेरे लिये अधिक कल्याणकारक ही होगा ।।१।४६।।शस्त्रविहीन अप्रतीकारी भी हूँ, कौरव सशस्त्र भरे सारे।
मरना भी श्रेयस्कर होगा, धृतराष्ट्र तनय यदि मुझे मारे।।१।४६।।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ।।१।४६।।
यदि = यदि; (मामप्रतीकारमशस्त्रं =माम्+अप्रतीकारम् +अशस्त्रम्); माम्=मुझे; अप्रतीकारम् = न सामना करने वाले को;अशस्त्रम् = शस्त्ररहित: शस्त्रपाणय: = शस्त्रधारी; धार्तराष्ट्रा: =धृतराष्ट्र के पुत्र; रणे = रण में;(हन्युस्तन्मे=हन्यु:+तत्+मे); हन्यु: = मारें; तत् =वह; मे = मेरे ; क्षेमतरम् = अतिकल्याण कारक; भवेत् = होगा;
यदि मुझ शस्त्ररहित एवं सामना न करने वाले को शस्त्रधारी धृतराष्ट्र के पुत्र रण में मार डालें तो वह मारना भी मेरे लिये अधिक कल्याणकारक ही होगा ।।१।४६।।शस्त्रविहीन अप्रतीकारी भी हूँ, कौरव सशस्त्र भरे सारे।
मरना भी श्रेयस्कर होगा, धृतराष्ट्र तनय यदि मुझे मारे।।१।४६।।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'
श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 045-01-045(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यता: ।।१।४५।।
अहो = ओह; बत = कितना आश्चर्य है; महत्पापम् = महान् पाप; कर्तुम् = करने को; व्यवसिता: = तैयार हुए हैं;वयम् = हम लोग; (यद्राज्यसुखलोभेन = यत्+राज्यसुखलोभेन); यत् = जो कि; राज्यसुखलोभेन =राज्य और सुख के लोभ से; हन्तुम् = मारने के लिये; स्वजनम् = अपने कुल को; उद्यता: = उद्यत हुए हैं।
ओह ! कितना आश्चर्य है कि हम लोग बुद्धिमान होकर भी महान् पाप करने को तैयार हो गये हैं, जो राज्य तथा सुख के लोभ से स्वजनों को मारने के लिये उद्यत हो गये हैं ।।१।४५।।
ओह!घोर अचरज है कि हम प्रहार को उद्धत खड़ें,
राज्य सुख हित स्वजनों के प्राण लेने को बढ़ें ।
समझ भी है हमें पर कार्य यह अनुचित करें ?
स्वजनों को मारने से लगता हे माधव पाप बड़े ।।१।४५।।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यता: ।।१।४५।।
अहो = ओह; बत = कितना आश्चर्य है; महत्पापम् = महान् पाप; कर्तुम् = करने को; व्यवसिता: = तैयार हुए हैं;वयम् = हम लोग; (यद्राज्यसुखलोभेन = यत्+राज्यसुखलोभेन); यत् = जो कि; राज्यसुखलोभेन =राज्य और सुख के लोभ से; हन्तुम् = मारने के लिये; स्वजनम् = अपने कुल को; उद्यता: = उद्यत हुए हैं।
ओह ! कितना आश्चर्य है कि हम लोग बुद्धिमान होकर भी महान् पाप करने को तैयार हो गये हैं, जो राज्य तथा सुख के लोभ से स्वजनों को मारने के लिये उद्यत हो गये हैं ।।१।४५।।
ओह!घोर अचरज है कि हम प्रहार को उद्धत खड़ें,
राज्य सुख हित स्वजनों के प्राण लेने को बढ़ें ।
समझ भी है हमें पर कार्य यह अनुचित करें ?
स्वजनों को मारने से लगता हे माधव पाप बड़े ।।१।४५।।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'
श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 044-01-044(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।
नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ।।१।४४।।
उत्सन्नकुलधर्माणाम् = नष्ट हुए कुलधर्म वाले; मनुष्याणाम् = मनुष्यों का; जनार्दन =श्री कृष्ण; नरके = नरक में;अनियतम् = अनन्त कालतक; वास: = वास; (भवतीत्यनुशुश्रुम=भवति+इति+अनुशुश्रुम्); भवति = होता है; इति=इस प्रकार; अनुशुश्रुम =सुना है।
हे जनार्दन ! जिनका कुल-धर्म नष्ट हो गया है, ऐसे मनुष्यों का अनिश्चित काल तक नरक में वास होता है, इस प्रकार हम सुनते आये हैं ।।१।४४।।
कुलधर्म नष्ट हुआ जिनका,कृष्ण!नरक वे पाते हैं।
सुना है नर नरकवास में अनंत काल रह जाते हैं।।१।४४।।
नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ।।१।४४।।
उत्सन्नकुलधर्माणाम् = नष्ट हुए कुलधर्म वाले; मनुष्याणाम् = मनुष्यों का; जनार्दन =श्री कृष्ण; नरके = नरक में;अनियतम् = अनन्त कालतक; वास: = वास; (भवतीत्यनुशुश्रुम=भवति+इति+अनुशुश्रुम्); भवति = होता है; इति=इस प्रकार; अनुशुश्रुम =सुना है।
हे जनार्दन ! जिनका कुल-धर्म नष्ट हो गया है, ऐसे मनुष्यों का अनिश्चित काल तक नरक में वास होता है, इस प्रकार हम सुनते आये हैं ।।१।४४।।
कुलधर्म नष्ट हुआ जिनका,कृष्ण!नरक वे पाते हैं।
सुना है नर नरकवास में अनंत काल रह जाते हैं।।१।४४।।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'
श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 043-01-043(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)
दोषैरेतै: कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकै:।
उत्साद्यन्ते जातिधर्मा: कुलधर्माश्च शाश्वता: ।।१।४३।।
उत्साद्यन्ते जातिधर्मा: कुलधर्माश्च शाश्वता: ।।१।४३।।
(दोषैरेतै: =दोषै:+ एतै); दोषै: =दोषों से; एतै: = इन; कुलघ्नानाम् = कुल घातियों के; वर्णसंकरकारकै: = वर्णसंकरकारक; उत्साद्यन्ते = नष्ट हो जातेहैं;जातिधर्मा: = जातिधर्म; (कुलधर्माश्च =कुलधर्म:+च); कुलधर्म: =कुलधर्म; च = और; शाश्वता: = सनातन।
इन वर्णसंकरकारक दोषों के कारण कुलघातियों के सनातन कुल-धर्म और जाति-धर्म नष्ट हो जाते हैं ।।१।४३।।कुलधर्म सनातन मिट जाता है इन वर्णसंकर कारक दोष से।
जाति-धर्म कहाँ टिक पाता है इन कुलघातियों के दोष से ।।१।४३।।
जाति-धर्म कहाँ टिक पाता है इन कुलघातियों के दोष से ।।१।४३।।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'
श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 042-01-042(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)
संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रिया: ।।१।४२।।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रिया: ।।१।४२।।
संकर: = वर्णसंकर; च =और; कुलस्य = कुल को; (नरकायैव =निकाय+एव); नरकाय = नरक में ले जाने के लिये; एव = ही; कुलघ्रानाम् = कुल घातियों को;कुलस्य = कुल का; च =और;पतन्ति =गिर जाते हैं;पितर: = पितरलोग; (ह्येषां =हि+एषाम् ); हि = भी; एषाम् = इनके; लुप्तपिण्डोदकक्रिया: = लोप हुई पिण्ड और जल की क्रिया वाले।
वर्णसंकर कुलघातियों को तथा कुल को नरक में ले जाने के लिये ही होता है। लुप्त हुई पिण्ड और जल की क्रिया वाले अर्थात् श्राद्ध और तर्पण से वंचित इनके पितर लोग भी अधोगति को प्राप्त होते हैं ।।१।४२।।
कुल और कुलघातियों को नरक देने को प्रभो!
वर्णसंकर जन्म लेते इसी कारण हे अखिल विभो!
वर्णसंकर से पितृगण श्राद्ध नहीं पा सकते हैं।
तर्पणहीन हो ये पितृगण नरकवास पा जाते हैं।।१।४२।।
वर्णसंकर कुलघातियों को तथा कुल को नरक में ले जाने के लिये ही होता है। लुप्त हुई पिण्ड और जल की क्रिया वाले अर्थात् श्राद्ध और तर्पण से वंचित इनके पितर लोग भी अधोगति को प्राप्त होते हैं ।।१।४२।।
कुल और कुलघातियों को नरक देने को प्रभो!
वर्णसंकर जन्म लेते इसी कारण हे अखिल विभो!
वर्णसंकर से पितृगण श्राद्ध नहीं पा सकते हैं।
तर्पणहीन हो ये पितृगण नरकवास पा जाते हैं।।१।४२।।
हरि ॐ तत्सत्।
श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'
श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 041-01-041(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रिय:।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकर: ।।१।४१।।(अधर्माभिभवात्कृष्ण=अधर्म+अभिभवात्+कृष्ण); अधर्म =पाप;अभिभवात् = अधिक बढ़ जाने से; प्रदुष्यन्ति = दूषित हो जाती हैं; कुलस्त्रिय: = कुल की स्त्रियां; स्त्रीषु = स्त्रियों के; दुष्टासु = दूषित होने पर; वार्ष्णेय =हे वृष्णिवंशी (श्री कृष्ण); जायते = उत्पन्न होता है; वर्णसंकर: = वर्णसंकर ।
हे श्रीकृष्ण! पाप के अधिक बढ जाने से कुल की स्त्रियाँ अत्यन्त दूषित हो जाती हैं और हे वार्ष्णेय! स्त्रियों के दूषित हो जाने पर वर्णसंकर उत्पन्न होते हैं।।१।४१।।
कुल नारी दुषित हो जाती हैं जब पाप बहुत बढ़ जाता है।
वर्णसंकर उत्पन्न होते हैं ज्यों कृष्ण! पाप अति छाता है।।१।४१।।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकर: ।।१।४१।।(अधर्माभिभवात्कृष्ण=अधर्म+अभिभवात्+कृष्ण); अधर्म =पाप;अभिभवात् = अधिक बढ़ जाने से; प्रदुष्यन्ति = दूषित हो जाती हैं; कुलस्त्रिय: = कुल की स्त्रियां; स्त्रीषु = स्त्रियों के; दुष्टासु = दूषित होने पर; वार्ष्णेय =हे वृष्णिवंशी (श्री कृष्ण); जायते = उत्पन्न होता है; वर्णसंकर: = वर्णसंकर ।
हे श्रीकृष्ण! पाप के अधिक बढ जाने से कुल की स्त्रियाँ अत्यन्त दूषित हो जाती हैं और हे वार्ष्णेय! स्त्रियों के दूषित हो जाने पर वर्णसंकर उत्पन्न होते हैं।।१।४१।।
कुल नारी दुषित हो जाती हैं जब पाप बहुत बढ़ जाता है।
वर्णसंकर उत्पन्न होते हैं ज्यों कृष्ण! पाप अति छाता है।।१।४१।।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'
श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 040-01-040(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्मा: सनातना:।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ।।१।४०।।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ।।१।४०।।
कुलक्षये =कुल के नाश होने से; प्रणश्यन्ति = नष्ट हो जाते हैं; कुलधर्मा: = कुलधर्म; सनातना: = सनातन; धर्मे नष्टे = धर्म के नाश होने से;कुलं = कुल; (कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत = कृत्स्नम्+अधर्म:+अभिभवति+उत) कृत्स्नम् = संपूर्ण; अधर्म: = पाप; अभिभवति = बहुत बढ़ जाता है;उत = भी ।
कुल के नाश हो जाने से सनातन कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं, धर्म के नाश हो जाने पर सम्पूर्ण कुल में पाप भी बहुत बढ़ जाता है ।।१।४०।
कुल नष्ट होने पर कुलधर्म सनातन मिट जाता है।
धर्म विनष्ट हुआ ज्यों ही तो पाप बहुत बढ़ जाता है।।१।४०।।
श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 038/039-01-038/039(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतस: ।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ।।१।३८।।
कथं न ज्ञेयमस्माभि: पापादस्मान्निवर्तितुम् ।कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ।।१।३९।।
(यद्यप्येते = यदि+अपि+ते); यदि = यदि; अपि = भी; एते = ये; न = नहीं; पश्यन्ती = देखते हैं; (लोभोपहतचेतस: = लोभ+उपहत+चेतस: ); लोभ =लोभ; उपहत= अभिभूत; चेतस: = चित्त वाले; (कुलक्षयकृतम् = कुल +क्षय +कृतम्); कुल = कुल; क्षय = नाश; कृतम् = किया हुआ;
दोषम् = दोष को; मित्रद्रोहे = मित्रों के साथ विरोध करने में; पातकम् = पापको;कथम् = क्यों; न =नहीं; ( ज्ञेयमस्माभि: = ज्ञेयम्+अस्माभि: ); ज्ञेयम् = विचार करना चाहिए; अस्माभि: = हम लोगों को;( पापादस्मान्निवर्तितुम् =पापात् +अस्मान्+निवर्तितुम् ); पापात् =पाप से; अस्मान् = हमलोगों को; निवर्तितुम् = बचने के लिये; कुलक्षयकृतम् = कुल के नाश करने से किए गए; दोषम् = दोष ( प्रपश्यद्भिर्जनार्दन = प्रपश्यद्भि:+ जनार्दन); प्रपश्यभ्दि: = जानने वालों के द्वारा; जनार्दन = हे जनार्दन (श्री कृष्ण)!
यद्यपि लोभ से अभिभूत होकर ये लोग कुल के नाश से उत्पन्न दोष को और मित्रों के साथ विरोध करने में किए गए पाप को नहीं देखते, तो भी हे जनार्दन ! कुल के नाश से उत्पन्न दोष को जानने वाले हम लोगों को इस पाप से बचने के लिए क्यों नहीं विचार करना चाहिए ।।१।३८-३९।।
ये मित्र द्रोही लोभ के वश, कुल नाश करने को खड़े।
मित्र द्रोह परम दोष है, कुलक्षयी को लगेंगे पाप बड़े।।
हम जानते कुल नाश से , क्या दोष लगता है प्रभु!
हमें ज्ञात है यह पाप है, बचें न क्यों हे अखिल विभू।।१।३८-३९।।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ।।१।३८।।
कथं न ज्ञेयमस्माभि: पापादस्मान्निवर्तितुम् ।कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ।।१।३९।।
(यद्यप्येते = यदि+अपि+ते); यदि = यदि; अपि = भी; एते = ये; न = नहीं; पश्यन्ती = देखते हैं; (लोभोपहतचेतस: = लोभ+उपहत+चेतस: ); लोभ =लोभ; उपहत= अभिभूत; चेतस: = चित्त वाले; (कुलक्षयकृतम् = कुल +क्षय +कृतम्); कुल = कुल; क्षय = नाश; कृतम् = किया हुआ;
दोषम् = दोष को; मित्रद्रोहे = मित्रों के साथ विरोध करने में; पातकम् = पापको;कथम् = क्यों; न =नहीं; ( ज्ञेयमस्माभि: = ज्ञेयम्+अस्माभि: ); ज्ञेयम् = विचार करना चाहिए; अस्माभि: = हम लोगों को;( पापादस्मान्निवर्तितुम् =पापात् +अस्मान्+निवर्तितुम् ); पापात् =पाप से; अस्मान् = हमलोगों को; निवर्तितुम् = बचने के लिये; कुलक्षयकृतम् = कुल के नाश करने से किए गए; दोषम् = दोष ( प्रपश्यद्भिर्जनार्दन = प्रपश्यद्भि:+ जनार्दन); प्रपश्यभ्दि: = जानने वालों के द्वारा; जनार्दन = हे जनार्दन (श्री कृष्ण)!
यद्यपि लोभ से अभिभूत होकर ये लोग कुल के नाश से उत्पन्न दोष को और मित्रों के साथ विरोध करने में किए गए पाप को नहीं देखते, तो भी हे जनार्दन ! कुल के नाश से उत्पन्न दोष को जानने वाले हम लोगों को इस पाप से बचने के लिए क्यों नहीं विचार करना चाहिए ।।१।३८-३९।।
ये मित्र द्रोही लोभ के वश, कुल नाश करने को खड़े।
मित्र द्रोह परम दोष है, कुलक्षयी को लगेंगे पाप बड़े।।
हम जानते कुल नाश से , क्या दोष लगता है प्रभु!
हमें ज्ञात है यह पाप है, बचें न क्यों हे अखिल विभू।।१।३८-३९।।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'
श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 037-01-037(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान् ।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिन: स्याम माधव ।।१।३७।।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिन: स्याम माधव ।।१।३७।।
( तस्मान्नार्हा =तस्मात्+न+आर्हा );तस्मात् = इससे; न अर्हा: = योग्य नहीं हैं; वयम् =हम ; हन्तुम् = मारने के लिये; (धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान् = धार्तराष्ट्रान् +स्वबान्धवान् ); धार्तराष्ट्रान् =धृतराष्ट्र के पुत्रों को; स्वबान्धवान् = अपने बंधुओं; स्वजनम् = अपने कुटुम्बको; हि =क्योंकि; कथम् = कैसे; हत्वा = मारकर; सुखिन: = सुखी; स्याम =होंगे; माधव =हे माधव ।
अतएव हे माधव! अपने ही बन्धु धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारने के लिये हम योग्य नहीं हैं, क्योंकि अपने ही बन्धुओं को मारकर हम कैसे सुखी होंगे ? ।।१।३७।।
हे माधव!नहीं हम योग्य हैं, मारूं धार्तराष्ट्रों को यहाँ ।
स्वजनों को ही मारकर,हम होंगे सुखी माधव! कहाँ।।१।३७।।
हे माधव!नहीं हम योग्य हैं, मारूं धार्तराष्ट्रों को यहाँ ।
स्वजनों को ही मारकर,हम होंगे सुखी माधव! कहाँ।।१।३७।।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'
श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 036-01-036(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)
निहत्य धार्तराष्ट्रान्न: का प्रीतिस्याज्जनार्दन ।
पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिन: ।१।३६।।
निहत्य = मारकर (भी);( धार्तराष्ट्रान्न: = धार्तराष्ट्रान् +न: ) धार्तराष्ट्रान् = धृतराष्ट्र के पुत्रों के;न: = हमें; का =क्या; ( प्रीतिस्याज्जनार्दन = प्रीति:+स्यात्+जनार्दन,)प्रीति: = प्रसन्नता; स्यात् = होगी; जनार्दन: = जनों के दी:ख हरने वाले; (पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिन: = पापम्+एव+आश्रयेत्+अस्मान्+हत्वा+एतान् आततायिन: ); पापम् = पाप; एव = ही; आश्रयेत् =लगेगा; अस्मान् = हमें; हत्वा = मारकर; एतान् = इन; आततायिन: = आततायियों को ।
हे जनार्दन! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारकर तो हमें पाप ही लगेगा ।।१।३६।।
हे जनार्दन! होगी खुशी क्या हमें धृतराष्ट्र सुतों को मारकर।
क्या न होगा पाप अवश्य ही इन आततायियों को संहार कर ।।१।३६।।
निहत्य = मारकर (भी);( धार्तराष्ट्रान्न: = धार्तराष्ट्रान् +न: ) धार्तराष्ट्रान् = धृतराष्ट्र के पुत्रों के;न: = हमें; का =क्या; ( प्रीतिस्याज्जनार्दन = प्रीति:+स्यात्+जनार्दन,)प्रीति: = प्रसन्नता; स्यात् = होगी; जनार्दन: = जनों के दी:ख हरने वाले; (पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिन: = पापम्+एव+आश्रयेत्+अस्मान्+हत्वा+एतान् आततायिन: ); पापम् = पाप; एव = ही; आश्रयेत् =लगेगा; अस्मान् = हमें; हत्वा = मारकर; एतान् = इन; आततायिन: = आततायियों को ।
हे जनार्दन! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारकर तो हमें पाप ही लगेगा ।।१।३६।।
हे जनार्दन! होगी खुशी क्या हमें धृतराष्ट्र सुतों को मारकर।
क्या न होगा पाप अवश्य ही इन आततायियों को संहार कर ।।१।३६।।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'
शनिवार, 24 फ़रवरी 2024
श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक पाठ 033/034/035-01-033/034/035(हिन्दी पद्यानुवाद सहित)
येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगा: सुखानि च ।
ते इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ।।१।३३।।
आचार्या: पितर: पुत्रास्तथैव च पितामहा: ।
मातुला: श्वशुरा: पौत्रा श्याला: सम्बंधिनस्तथा ।।१।३४।।
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन ।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतो: किं नु महीकृते।।१।३५।।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतो: किं नु महीकृते।।१।३५।।
(येषामर्थे = येषाम्+अर्थे); येषाम् = जिनके; अर्थे = लिये; काॾ.क्षितम् = इच्छित हैं; न:=हमारा;राज्यम्=राज्य; भोगा: = भोग; सुखानि = सुख; च = और; ते = वे (ही); इमे = यह सब; अवस्थिता: = खड़े हैं; युद्धे = युद्ध में;(प्राणांस्त्यक्त्वा =प्राणान् +त्यक्त्वा); प्राणान् = जीवन (की आशा) को; त्यक्त्वा =त्यागकर; धनानि = धन; आचार्या: = गुरुजन; पितर: = पितृगण; पुत्रा: = पुत्रगण; (पुत्रास्तथैव = पुत्रा:+तथा+एव); पुत्रा: = पुत्र; तथा = वैसे; एव = निश्चय ही; च = भी; पितामहा: = दादा; मातुला: = मामा; श्वशुरा: = ससुर; पौत्रा: = पोते;श्याला:=साले;(सम्बंधिनस्तथा = सम्बंधिन:+तथा); सम्बन्धिन: = सम्बन्धी लोग; तथा = और; एतान् =इन सबको; न: = हमारा (एतान्न = एतान्+न); हन्तुम् =मारना; इच्छामि = चाहता हूँ;(हन्तुमिच्छामि = हन्तुम्+ इच्छामि): (घ्नतोपि=घ्नत:+अपि); घ्नत:; = मारे जाने पर; अपि = भी; मधुसूदन = मधु राक्षस को मारनेवाले श्री कृष्ण!, त्रैलोक्यराज्यस्य = तीनों लोकों के राज्य के; हेतो: = के लिए; महीकृते = पृथिवी के लिये ; नु किम् = कहना ही क्या है।
हम जिनके लिये राज्य, भोग और सुख चाहते हैं, वे ही ये सब धन और जीवन की आशा को त्याग कर युद्ध में खड़े हैं ।।१।३३।।।
गुरुजन, पितृगण, पुत्रगण,और उसी प्रकार पितामह, मामा लोग, ससुर, पौत्र, सालें तथा अन्य भी सम्बन्धी लोग हैं ।।१।३४।
हे मधुसूदन! मुझे मारने पर भी अथवा तीनों लोकों के राज्य के लिये भी मै इन सबको मारना नहीं चाहता, फिर पृथ्वी के लिये तो कहना ही क्या है ? ।।१।३५।।
जिनके लिए मैं चाहता राज्य सुख और भोग को।
प्राण धन की आस छोड़ें, रण में खड़े वे योग को।।१।३३।।
प्राण धन की आस छोड़ें, रण में खड़े वे योग को।।१।३३।।
पिता पुत्र और गुरु पितामह रण-आंगन में खड़े।
मामा ससुर और पौत्र सालें अन्य सम्बन्धी बड़े।।१।३४।।
हे नाथ! त्रिलोक के राज्य हित न मारता, मारें मुझे।
मही सुख अति तुच्छ है, संघारना क्यों बिन बुझे।।१।३५।।
मामा ससुर और पौत्र सालें अन्य सम्बन्धी बड़े।।१।३४।।
हे नाथ! त्रिलोक के राज्य हित न मारता, मारें मुझे।
मही सुख अति तुच्छ है, संघारना क्यों बिन बुझे।।१।३५।।
हरि ॐ तत्सत्।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य'
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