सञ्जय उवाच-
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा।
आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत्
।।१।२।।
संजय = संजय: ; उवाच = कहा, बोले ; दृष्ट्वा = देखकर ; तु = लेकिन ; पाणडवानीकं = (पाण्डव+अनीकं) पाण्डवों की सेना ; व्यूढं = व्यूह रचना को ; (दुर्योधनस्तदा = दुर्योधन: + तदा ) ; तदा = तब, उस समय ; (आचार्यमुपसंगम्य = आचार्यम् + उपसंगम्य) ; आचार्यम् = आचार्य, गुरु (को) ; उपसंगम्य = पास जाकर ; राजा = राजा ; ( वचनमब्रवीत् = वचनम् + अब्रवीत् ) ; वचनम् = वचन ; अब्रवीत् = कहा।
संजय ने कहा -हे राजन ! पाण्डु-पुत्रों द्वारा किए गए सेना की व्यूहरचना को देखकर दुर्योधन अपने गुरु (द्रोणाचार्य) के पास जाकर उन्होंने ये वचन कहे।
संजय ने कहा-
व्यूह रचना जब सैनिकों की, पाण्डवों ने कर लिया।
देखकर राजा दुर्योधन, गुरु निकट जा विनती किया ।।१।२।।
- श्री तारकेश्वर झा 'आचार्य
हरि ॐ तत्सत्।
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जवाब देंहटाएंअध्ययन की सुगमता हेतु यह सरल और सहज क्रमिक रूप से उपलब्ध रहेगा। स्वरचित हिन्दी पद्यानुवाद मूल श्लोकों के भाव को याद रखने में पाठकों के लिए श्रेष्ठ-सेव्य है।
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